त्वत्सम्भावितमात्मानं - सम्मान और आत्मविश्वास

17 जून 2026

त्वत्सम्भावितमात्मानं बहु मन्यामहे वयम्। प्रायः प्रत्ययमाधत्ते स्वगुणेषूत्तमादरः॥

tvatsambhāvitam ātmānaṃ bahu manyāmahe vayam । prāyaḥ pratyayam ādhatte svaguṇeṣūttamādaraḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

स्नेहपूर्ण सम्मान और स्वीकार्यता व्यक्ति को गर्व और संतोष का अनुभव कराती है। इससे जहां आत्मविश्वास बढ़ता है, वहीं एक नई ऊर्जा और उत्साह का भी संचार होता है।

त्वत्सम्भावितमात्मानं बहु मन्यामहे वयम् का अर्थ

किसी भी व्यक्ति द्वारा आदरपूर्वक स्वीकार किए जाने के कारण, हम स्वयं को अत्यंत गौरवान्वित और धन्य अनुभव कर रहे हैं, क्योंकि यह सर्वथा सत्य है कि श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा प्रदान किया गया सम्मान, मनुष्य के भीतर उसके अपने ही गुणों के प्रति आत्मविश्वास को दृढ़तापूर्वक जागृत कर देता है।

शब्दार्थ

त्वत्सम्भावितम्tvatsambhāvitam

तुमसे सम्मानित

युष्मद् + सम् + √भू

आत्मानम्ātmānam

अपने को

आत्मन्

बहु मन्यामहे वयम्bahu manyāmahe vayam

हम बहुत मानते हैं

√मन्

प्रायःprāyaḥ

प्रायः

प्रत्ययम्pratyayam

विश्वास

प्रति + √इ

आधत्तेādhatte

स्थापित करता है

आ + √धा

स्वगुणेषुsvaguṇeṣu

अपने गुणों में

स्व + गुण

उत्तमादरःuttamādaraḥ

श्रेष्ठ जनों का आदर

उत्तम + आ + √दृ

व्याख्या

कालिदास के कुमारसम्भवम् में यह श्लोक आदरपूर्ण स्वीकृति के उस क्षण को व्यक्त करता है, जब किसी महान सत्ता द्वारा मान दिया जाना भीतर का विश्वास बढ़ा देता है। 'उत्तमादरः' का अर्थ है श्रेष्ठ जनों द्वारा दिया गया आदर, और 'प्रत्यय' का भाव है विश्वास, भरोसा या आत्मनिष्ठा। ऐसा सम्मान केवल प्रशंसा नहीं होता; वह व्यक्ति को अपने गुणों का मूल्य अधिक स्थिरता से पहचानने की शक्ति देता है। प्रधानमंत्री के संदेश के संदर्भ में यह श्लोक प्रोत्साहन और स्वीकार्यता की मानवीय गरिमा को सामने लाता है। स्नेहपूर्ण आदर व्यक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि संतुलित गर्व और संतोष जगाता है। जब सम्मान सच्चा होता है, तब वह नई ऊर्जा, उत्साह और अपने गुणों को और विकसित करने की प्रेरणा बन जाता है।

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सम्मान पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

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ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

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चरित्रनैतिकतासाहस
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भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य