एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्। क्रियते भास्करेणेव स्फारस्फुरिततेजसा॥
ekenāpi hi śūreṇa pādākrāntaṃ mahītalam । kriyate bhāskareṇeva sphārasphuritetejasā ॥
प्रधानमंत्री का संदेशवीरता और पराक्रम वो पूंजी है, जिससे हर कठिनाई का सामना किया जा सकता है। भारत के युवाओं का साहस और आत्मविश्वास इसी की प्रेरणा देता है।
एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं का अर्थ
सूर्य जिस प्रकार अपने प्रखर और विस्तृत तेज से समग्र पृथ्वी को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक वीर पूरी पृथ्वी को अपने पराक्रम से प्रभावित करता है।
शब्दार्थ
- एकेनekena
एक से
एक
- अपिapi
भी
- हिhi
निश्चय ही
- शूरेणśūreṇa
शूर के द्वारा
√शूर्
- पादाक्रान्तम्pādākrāntam
पैरों से आक्रान्त
पाद + आ + √क्रम्
- महीतलम्mahītalam
पृथ्वीतल
मही + तल
- क्रियतेkriyate
किया जाता है
√कृ
- भास्करेणbhāskareṇa
सूर्य के द्वारा
भास् + √कृ
- इवiva
के समान
- स्फारस्फुरिततेजसाsphārasphuritatejasā
विस्तीर्ण और स्फुरित तेज वाले
स्फार + √स्फुर् + तेजस्
व्याख्या
यह श्लोक सूर्य और वीर पुरुष के मध्य एक सशक्त तुलना प्रस्तुत करता है। जिस प्रकार सूर्य को पृथ्वी को आलोकित करने के लिए किसी सहायक की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार एक सच्चे शूर को भी किसी आश्रय की आवश्यकता नहीं होती। 'पादाक्रान्त' शब्द यह दर्शाता है कि वीरता केवल शारीरिक बल नहीं, अपितु अदम्य आत्मशक्ति और तेजस्विता का प्रतीक है, जो नीति काव्य की परंपरा में व्यक्तिगत उत्कर्ष की महिमा का गान करती है। मूल में 'एकेन अपि' पर बल है—एक से भी, अर्थात् संख्या की अपेक्षा ही अस्वीकार कर दी गई है। सूर्य का विशेषण भी इसी को पुष्ट करता है: 'स्फारस्फुरिततेजसा' अर्थात् विस्तीर्ण और स्फुरित होते तेज वाला—यह तेज उधार लिया हुआ नहीं, स्वयं से फूटता हुआ है। नीति काव्य की परम्परा में यह श्लोक एक शूर की क्षमता को संख्या-बल के सामने रखता है, और सूर्य का दृष्टान्त इसीलिए चुना गया है कि उसका कोई सहचर नहीं होता।
मूल पोस्ट
नीतिशतकम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंरत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥
bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥
नीतिशतकम् का यह श्लोक फलयुक्त वृक्षों और जलभरे मेघों के माध्यम से बताता है कि सज्जन समृद्धि में और विनम्र हो जाते हैं।
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।