वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
vande vāñchitalābhāya candrārdhakṛtaśekharām । vṛṣārūḍhāṃ śūladharāṃ śailaputrīṃ yaśasvinīm ॥
प्रधानमंत्री का संदेशनवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप देवी शैलपुत्री की पूजा का विधान है। उनके आशीर्वाद से हर किसी के जीवन में संयम, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो, यही कामना है।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् का अर्थ
जो भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो वृषभ पर आरूढ़ हैं और हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं, उन यशस्विनी देवी शैलपुत्री की मैं वंदना करता हूँ।
शब्दार्थ
- वन्देvande
मैं वन्दना करता हूँ
√वन्द्
- वाञ्छितलाभायvāñchitalābhāya
अभीष्ट की प्राप्ति के लिए
√वाञ्छ् + √लभ्
- चन्द्रार्धकृतशेखराम्candrārdhakṛtaśekharām
अर्धचन्द्र को शिरोभूषण बनाए हुए
चन्द्र + अर्ध + √कृ + शेखर
- वृषारूढाम्vṛṣārūḍhām
वृषभ पर आरूढ़
वृष + आ + √रुह्
- शूलधराम्śūladharām
त्रिशूल धारण किए
शूल + √धृ
- शैलपुत्रीम्śailaputrīm
शैलपुत्री
शैल + पुत्री
- यशस्विनीम्yaśasvinīm
यशस्विनी
यशस्
व्याख्या
शैलपुत्री का अर्थ पर्वत की पुत्री है और परम्परा उन्हें हिमवान की पुत्री मानती है। श्लोक कहता है कि वक्ता अभीष्ट की प्राप्ति के लिए वन्दना करता है; प्रयोजनवाचक 'वाञ्छितलाभाय' अपने आप में प्रत्येक इच्छा पूर्ण होने का वचन नहीं देता। आगे देवी को अर्धचन्द्र का मुकुट धारण किए, वृषभ पर आरूढ़, त्रिशूलधारिणी और यशस्विनी कहा गया है। अर्धचन्द्र को शान्ति, त्रिशूल को सृष्टि-पालन-संहार और वृषभ को धर्म का प्रतीक मानना पारम्परिक व्याख्या है, इन समासों का प्रत्यक्ष अर्थ नहीं।
मूल पोस्ट
नवदुर्गा स्तोत्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।