देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatam idaṁ jagad ātmaśaktyā niśśeṣa-devagaṇa-śakti-samūha-mūrtyā । tām ambikām akhila-deva-maharṣi-pūjyāṁ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशहमारी नारी शक्ति सशक्त भारत की पहचान है। देश की माताएं-बहनें और बेटियां अपनी अटूट संकल्पशक्ति, निष्ठा और सेवाभाव से आज हर क्षेत्र में भारतवर्ष का गौरव बढ़ा रही हैं।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या का अर्थ
जिन देवी ने अपनी शक्ति से इस संपूर्ण जगत को व्याप्त किया है और जो समस्त देवताओं की शक्तियों के समूह का साक्षात् स्वरूप हैं, उन समस्त देवताओं और महर्षियों द्वारा पूजनीया अम्बिका को हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं। वे जगदम्बा हमारा कल्याण करें।
शब्दार्थ
- देव्याdevyā
देवी के द्वारा
√दिव्
- ययाyayā
जिनसे
यद्
- ततम्tatam
व्याप्त
√तन्
- इदम् जगत्idaṁ jagat
यह जगत्
√गम्
- आत्मशक्त्याātmaśaktyā
अपनी शक्ति से
आत्मन् + शक्ति
यह करण कारक देवी द्वारा अपनी शक्ति से जगत् को व्याप्त करने का वर्णन करता है।
- निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्याniśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā
समस्त देवगणों की शक्ति के समूह-स्वरूप
निस् + शेष + देव + गण + शक्ति + समूह + मूर्ति
- ताम् अम्बिकाम्tām ambikām
उन अम्बिका को
अम्बा
- अखिलदेवमहर्षिपूज्याम्akhiladevamaharṣipūjyām
समस्त देवों और महर्षियों से पूज्य
अखिल + देव + महर्षि + √पूज्
- भक्त्याbhaktyā
भक्ति से
√भज्
- नताः स्मnatāḥ sma
हम नत हैं
√नम्
- विदधातुvidadhātu
विधान करें
वि + √धा
- शुभानिśubhāni
शुभ
√शुभ्
- सा नःsā naḥ
वे हमारे लिए
तद्
व्याख्या
यह मंत्र देवी को "निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या" के रूप में परिभाषित करता है, जिसका अर्थ है—सभी दिव्य शक्तियों का एकीकृत स्वरूप। आज के संदर्भ में, यह श्लोक इस विचार को पुष्ट करता है कि राष्ट्र का विकास उसकी नारी शक्ति के सामूहिक सामर्थ्य का परिणाम है। यह दर्शाता है कि महिलाएं समाज का केवल एक हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे आधारभूत शक्ति हैं जो हर क्षेत्र को गति और जीवंतता प्रदान करती हैं। यह श्लोक शक्रादि स्तुति का है, जिसे महिषासुर वध के पश्चात् देवगण गाते हैं—इसीलिए यहाँ उन्हें समस्त देवशक्तियों के समूह-स्वरूप कहा गया है। 'आत्मशक्त्या' उस शक्ति को बताता है जिससे देवी जगत् को व्याप्त करती हैं, जबकि पूर्ववर्ती समास उन्हें समस्त देवगण की शक्तियों के समूह-स्वरूप में प्रस्तुत करता है। शक्ति उधार ली गई थी या स्वतंत्र थी—श्लोक स्वयं ऐसा विरोध स्थापित नहीं करता।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।