कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या - कृषि ही जीवन का आधार

20 अप्रैल 2026

कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः। अन्नदः सर्वदश्चैव तस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः॥

kṛṣirdhanyā kṛṣirmedhyā jantūnāṁ jīvanaṁ kṛṣiḥ । annadaḥ sarvadaścaiva tasmācchreṣṭhataro hi saḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

कृषि हमारी समृद्धि की आधारशिला है और हमारे किसान भाई-बहन देश के अन्नदाता। इनका परिश्रम और समर्पण ही राष्ट्र की प्रगति को सुनिश्चित करता है।

कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं का अर्थ

खेती धन देने वाली है, बुद्धि को पवित्र करने वाली है और सभी जीवों का आधार है। जो किसान फसल उगाकर संसार को अन्न देता है, वह वास्तव में सबको सब कुछ देने वाला है, क्योंकि अन्न के बिना कोई भी अन्य दान या वस्तु काम नहीं आती, इसलिए वह कृषि करने वाला किसान सबसे श्रेष्ठ है।

शब्दार्थ

कृषिःkṛṣiḥ

कृषि

√कृष्

धन्याdhanyā

धन देने वाली

धन

मेध्याmedhyā

यज्ञयोग्य, पवित्र

मेध

जन्तूनाम्jantūnām

प्राणियों का

√जन्

जीवनम्jīvanam

जीवन

√जीव्

अन्नदःannadaḥ

अन्न देने वाला

अन्न + √दा

सर्वदःsarvadaḥ

सब कुछ देने वाला

सर्व + √दा

च एवcaiva

और निश्चय ही

तस्मात्tasmāt

इसलिए

तद्

श्रेष्ठतरःśreṣṭhataraḥ

अधिक श्रेष्ठ

श्रेष्ठ

हि सःhi saḥ

वही है

तद्

व्याख्या

यह श्लोक कृषि को धन्य या समृद्धिदायिनी, ‘मेध्या’ और प्राणियों का जीवन बताता है। यहाँ ‘मेध्या’ के अर्थ पवित्र, हितकर अथवा यज्ञ के योग्य हो सकते हैं; इसे इतना संकुचित नहीं करना चाहिए कि खेत का प्रत्येक श्रम स्वयं एक अनुष्ठान ही घोषित हो जाए। दूसरी पंक्ति अन्नदाता को सर्वदाता से जोड़कर उसे विशेष रूप से श्रेष्ठ कहती है। इसका आधार यह है कि अन्य सभी मानवीय गतिविधियाँ पहले पोषण पर निर्भर हैं। साथ दिया गया अर्थ इसी संक्षिप्त कथन को किसान की समाज के प्रमुख पोषक के रूप में प्रशंसा तक विकसित करता है।

मूल पोस्ट

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कृषि पाराशर से और सुभाषित

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23 दिस॰ 2025
कृषि पाराशर

सुवर्ण-रौप्य-माणिक्य-वसनैरपि पूरिताः। तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्ततृष्णया॥

suvarṇa-raupya-māṇikya-vasanair api pūritāḥ । tathāpi prārthayanti eva kṛṣakān bhaktatṛṣṇayā ॥

सोना, चाँदी, रत्न और उत्तम वस्त्र अन्न का स्थान नहीं ले सकते; समृद्ध व्यक्ति भी जीवन-निर्वाह के लिए किसान पर निर्भर है।

कृषिसमृद्धिविनम्रतासम्मान

कृषि पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि