कृषि पाराशर से सुभाषित
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नवीनतम अद्यतन: 21 जून 2026
20 अप्रैल 2026
कृषि पाराशर
कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः। अन्नदः सर्वदश्चैव तस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः॥
kṛṣirdhanyā kṛṣirmedhyā jantūnāṁ jīvanaṁ kṛṣiḥ । annadaḥ sarvadaścaiva tasmācchreṣṭhataro hi saḥ ॥
यह श्लोक कृषि को धन देने वाली और सभी जीवों का आधार बताता है। अन्न देने वाला किसान वास्तव में सबसे श्रेष्ठ है।
कृषिनिःस्वार्थ सेवासमृद्धि
23 दिस॰ 2025
कृषि पाराशर
सुवर्ण-रौप्य-माणिक्य-वसनैरपि पूरिताः। तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्ततृष्णया॥
suvarṇa-raupya-māṇikya-vasanair api pūritāḥ । tathāpi prārthayanti eva kṛṣakān bhaktatṛṣṇayā ॥
सोना, चाँदी, रत्न और उत्तम वस्त्र अन्न का स्थान नहीं ले सकते; समृद्ध व्यक्ति भी जीवन-निर्वाह के लिए किसान पर निर्भर है।
कृषिसमृद्धिविनम्रतासम्मान