निःस्वार्थ सेवा पर सुभाषित

15 सुभाषित इस विषय पर

यह विषय 6 स्रोतों से आए 15 सुभाषितों को एक साथ लाता है।

नवीनतम अद्यतन: 8 अक्टू॰ 2026

8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि
2 सित॰ 2026
महाभारत

अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥

abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥

महाभारत का यह श्लोक अभय देने वाले की प्रशंसा करता है और तीनों लोकों में प्राण के समान किसी दान को नहीं मानता।

नैतिकतानिःस्वार्थ सेवा
26 अग॰ 2026
महाभारत

ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥

jñānavṛddhān praśaṃsantaḥ śuśrūṣantaḥ parasparam । vinivṛttābhisandhānāḥ sukhamedhanti sarvaśaḥ ॥

महाभारत का यह श्लोक ज्ञानवृद्धों के सम्मान, परस्पर सेवा और छिपे स्वार्थ के त्याग को सामूहिक सुख एवं उन्नति का आधार बताता है।

विद्यासम्मानएकतानिःस्वार्थ सेवासफलता
21 अग॰ 2026

जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत मानवाः। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः॥

jīvanaṃ svaṃ parārthāya nityaṃ yacchata mānavāḥ । iti sandeśamākhyātuṃ samudraṃ yānti nimnagāḥ ॥

यह संस्कृत सुभाषित मनुष्यों से कहता है कि अपना जीवन दूसरों के हित में दो; समुद्र की ओर बहती नदियाँ यही सन्देश सिखाती हैं।

निःस्वार्थ सेवानैतिकताकर्तव्य
19 अग॰ 2026
श्रीमद्भागवत पुराण

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा॥

etāvaj janmasāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu । prāṇair arthair dhiyā vācā śreya evācaret sadā ॥

श्रीमद्भागवत पुराण का यह श्लोक कहता है कि जन्म तब सार्थक होता है जब मनुष्य प्राण, धन, बुद्धि और वाणी से सदा दूसरों का कल्याण करे।

निःस्वार्थ सेवानैतिकताकर्तव्यसफलता
7 अग॰ 2026
रसिकजीवनम्

किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥

kiṃ candramāḥ pratyupakāralipsayā karoti gobhiḥ kumudāvabodhanam । svabhāva evonnatacetasāṃ satāṃ paropakāravyasanaṃ hi jīvitam ॥

चन्द्रमा बिना प्रत्युपकार की इच्छा के कुमुदिनी को जगाता है; वैसे ही सज्जनों के लिए परोपकार जीवन का स्वाभाविक भाव है।

निःस्वार्थ सेवाचरित्र
10 जुल॰ 2026
विदुर नीति

हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥

hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥

महाभारत का यह श्लोक सिखाता है कि वही कर्म श्रेष्ठ है जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो, आत्मा को शांति दे और ईश्वर-समर्पण से जुड़ा हो।

निःस्वार्थ सेवाधर्मनैतिकताआध्यात्मिकता
7 जुल॰ 2026
नीतिशतकम्

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥

bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥

नीतिशतकम् का यह श्लोक फलयुक्त वृक्षों और जलभरे मेघों के माध्यम से बताता है कि सज्जन समृद्धि में और विनम्र हो जाते हैं।

विनम्रतानिःस्वार्थ सेवाचरित्रप्रकृति
23 जून 2026
कैवल्योपनिषद्

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति॥

na karmaṇā na prajayā dhanena tyāgenaike amṛtatvam ānaśuḥ । pareṇa nākaṃ nihitaṃ guhāyāṃ vibhrājate yad yatayo viśanti ॥

कैवल्योपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि अमरत्व त्याग, निःस्वार्थ समर्पण और उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठा से प्राप्त होता है।

निःस्वार्थ सेवाकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता
27 अप्रैल 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥

chāyāmanyasya kurvanti tiṣṭhanti svayamātape । phalānyapi parārthāya vṛkṣāḥ satpuruṣā iva ॥

यह श्लोक वृक्षों की तुलना सज्जन पुरुषों से करता है, जो स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का कल्याण करते हैं।

निःस्वार्थ सेवानैतिकताचरित्र
23 अप्रैल 2026
नीतिशतकम्

पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥

padmākaraṁ dinakaro vikacīkaroti candro vikāsayati kairavacakravālam । nābhyarthito jaladharo’pi jalaṁ dadāti santaḥ svayaṁ parahiteṣu kṛtābhiyogāḥ ॥

सूर्य, चन्द्र और मेघों के उदाहरण से यह श्लोक बताता है कि सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ या प्रार्थना के दूसरों का भला करते हैं।

निःस्वार्थ सेवाप्रकृतिनैतिकता
20 अप्रैल 2026
कृषि पाराशर

कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः। अन्नदः सर्वदश्चैव तस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः॥

kṛṣirdhanyā kṛṣirmedhyā jantūnāṁ jīvanaṁ kṛṣiḥ । annadaḥ sarvadaścaiva tasmācchreṣṭhataro hi saḥ ॥

यह श्लोक कृषि को धन देने वाली और सभी जीवों का आधार बताता है। अन्न देने वाला किसान वास्तव में सबसे श्रेष्ठ है।

कृषिनिःस्वार्थ सेवासमृद्धि
1 अप्रैल 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥

pibanti nadyaḥ svayameva nāmbhaḥ svayaṃ na khādanti phalāni vṛkṣāḥ । nādanti sasyaṃ khalu vārivāhāḥ paropakārāya satāṃ vibhūtayaḥ ॥

प्रकृति के उदाहरणों — नदियों, वृक्षों और बादलों — के माध्यम से यह सुभाषित परोपकार और निःस्वार्थ जीवन की महत्ता को दर्शाता है।

निःस्वार्थ सेवानैतिकताविनम्रता
19 दिस॰ 2025
महाभारत

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥

puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥

फल-फूल देने वाले वृक्ष रोपण के बहुत बाद तक दूसरों का कल्याण करते हैं, इसलिए वृक्षारोपण निःस्वार्थ सेवा का स्थायी रूप है।

निःस्वार्थ सेवाप्रकृतिनैतिकता