किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥
kiṃ candramāḥ pratyupakāralipsayā karoti gobhiḥ kumudāvabodhanam । svabhāva evonnatacetasāṃ satāṃ paropakāravyasanaṃ hi jīvitam ॥
किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति का अर्थ
चन्द्रमा किसी प्रत्युपकार की इच्छा से अपनी किरणों द्वारा कुमुदिनी को प्रकाशित नहीं करता, अपितु यह उसका स्वाभाविक गुण है। उसी प्रकार महान और उदार हृदय वाले सज्जन बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के दूसरों का हित करते हैं, क्योंकि परोपकार उनके स्वभाव में ही होता है।
शब्दार्थ
- किम्kim
क्या
किम्
- चन्द्रमाःcandramāḥ
चन्द्रमा
चन्द्रमस्
- प्रत्युपकारलिप्सयाpratyupakāralipsayā
प्रत्युपकार की इच्छा से
प्रति + उप + √कृ + √लभ्
- करोतिkaroti
करता है
√कृ
- गोभिःgobhiḥ
किरणों से
गो
'गो' का अर्थ किरण और गाय दोनों; यहाँ किरण।
- कुमुदावबोधनम्kumudāvabodhanam
कुमुदों का जागरण
कुमुद + अव + √बुध्
- स्वभावःsvabhāvaḥ
स्वभाव
स्व + √भू
- एवeva
ही
- उन्नतचेतसाम्unnatacetasām
उन्नत चित्त वालों का
उद् + √नम् + चेतस्
- सताम्satām
सज्जनों का
√अस्
- परोपकारव्यसनम्paropakāravyasanam
परोपकार की लगन
पर + उप + √कृ + व्यसन
- हि जीवितम्hi jīvitam
ही जीवन है
√जीव्
व्याख्या
चन्द्रमा कुमुदिनी को जगाने से पहले उससे किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं करता। ‘प्रत्युपकारलिप्सया’ के प्रश्न के माध्यम से श्लोक बताता है कि उसका प्रकाश किसी लेन-देन से नहीं, उसके स्वभाव से निकलता है। इसी उपमा से सज्जनों के जीवन में ‘परोपकारव्यसनम्’ को रखा गया है। यहाँ ‘व्यसन’ का अर्थ हानिकारक आसक्ति नहीं, बल्कि ऐसा गहरा और निरन्तर रुझान है जो जीवन का स्वभाव बन गया हो। ‘स्वभाव एव’ इस बात पर बल देता है कि सच्चा परोपकार प्रदर्शन, गणना या फल की आशा से अलग है। श्लोक व्यक्तिगत आवश्यकताओं के निषेध की बात नहीं करता; वह सज्जन के उस ऊँचे चरित्र को दिखाता है जिसमें दूसरों का हित सहज अभिव्यक्ति बन जाता है। चन्द्रमा और कुमुदिनी की छवि इस आदर्श को शांत और स्वाभाविक बनाती है: भलाई न आग्रह की प्रतीक्षा करती है, न प्रतिफल की।
मूल पोस्ट
रसिकजीवनम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
निःस्वार्थ सेवा पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंभस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।