किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया - परोपकार का स्वभाव

7 अग॰ 2026

किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥

kiṃ candramāḥ pratyupakāralipsayā karoti gobhiḥ kumudāvabodhanam । svabhāva evonnatacetasāṃ satāṃ paropakāravyasanaṃ hi jīvitam ॥

किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति का अर्थ

चन्द्रमा किसी प्रत्युपकार की इच्छा से अपनी किरणों द्वारा कुमुदिनी को प्रकाशित नहीं करता, अपितु यह उसका स्वाभाविक गुण है। उसी प्रकार महान और उदार हृदय वाले सज्जन बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के दूसरों का हित करते हैं, क्योंकि परोपकार उनके स्वभाव में ही होता है।

शब्दार्थ

किम्kim

क्या

किम्

चन्द्रमाःcandramāḥ

चन्द्रमा

चन्द्रमस्

प्रत्युपकारलिप्सयाpratyupakāralipsayā

प्रत्युपकार की इच्छा से

प्रति + उप + √कृ + √लभ्

करोतिkaroti

करता है

√कृ

गोभिःgobhiḥ

किरणों से

गो

'गो' का अर्थ किरण और गाय दोनों; यहाँ किरण।

कुमुदावबोधनम्kumudāvabodhanam

कुमुदों का जागरण

कुमुद + अव + √बुध्

स्वभावःsvabhāvaḥ

स्वभाव

स्व + √भू

एवeva

ही

उन्नतचेतसाम्unnatacetasām

उन्नत चित्त वालों का

उद् + √नम् + चेतस्

सताम्satām

सज्जनों का

√अस्

परोपकारव्यसनम्paropakāravyasanam

परोपकार की लगन

पर + उप + √कृ + व्यसन

हि जीवितम्hi jīvitam

ही जीवन है

√जीव्

व्याख्या

चन्द्रमा कुमुदिनी को जगाने से पहले उससे किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं करता। ‘प्रत्युपकारलिप्सया’ के प्रश्न के माध्यम से श्लोक बताता है कि उसका प्रकाश किसी लेन-देन से नहीं, उसके स्वभाव से निकलता है। इसी उपमा से सज्जनों के जीवन में ‘परोपकारव्यसनम्’ को रखा गया है। यहाँ ‘व्यसन’ का अर्थ हानिकारक आसक्ति नहीं, बल्कि ऐसा गहरा और निरन्तर रुझान है जो जीवन का स्वभाव बन गया हो। ‘स्वभाव एव’ इस बात पर बल देता है कि सच्चा परोपकार प्रदर्शन, गणना या फल की आशा से अलग है। श्लोक व्यक्तिगत आवश्यकताओं के निषेध की बात नहीं करता; वह सज्जन के उस ऊँचे चरित्र को दिखाता है जिसमें दूसरों का हित सहज अभिव्यक्ति बन जाता है। चन्द्रमा और कुमुदिनी की छवि इस आदर्श को शांत और स्वाभाविक बनाती है: भलाई न आग्रह की प्रतीक्षा करती है, न प्रतिफल की।

मूल पोस्ट

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