भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhir yajatrāḥ । sthirair aṅgais tuṣṭuvāṃsas tanūbhir vyaśema devahitaṃ yad āyuḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशभद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा का अर्थ
हे देवों, हम अपने कानों से कल्याणकारी बातें सुनें; हे पूजनीय देवों, हम अपनी आँखों से कल्याणकारी दृश्य देखें। हम स्थिर अंगों और शरीरों के साथ आपकी स्तुति करते हुए देवों द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करें।
शब्दार्थ
- भद्रम्bhadram
शुभ
भद्र
- कर्णेभिःkarṇebhiḥ
कानों से
कर्ण
- शृणुयामśṛṇuyāma
हम सुनें
√श्रु
- देवाःdevāḥ
हे देवगण
√दिव्
- पश्येमpaśyema
हम देखें
√दृश्
- अक्षभिःakṣabhiḥ
आँखों से
अक्षि
- यजत्राःyajatrāḥ
हे यजनीय
√यज्
- स्थिरैःsthiraiḥ
सुदृढ़
√स्था
- अङ्गैःaṅgaiḥ
अंगों से
अङ्ग
- तुष्टुवांसःtuṣṭuvāṁsaḥ
स्तुति करते हुए
√स्तु
- तनूभिःtanūbhiḥ
शरीरों से
तनू
- व्यशेमvyaśema
हम पूरी तरह जीएँ
वि + √अश्
- देवहितम्devahitam
देवों द्वारा नियत
देव + √धा
- यत् आयुःyad āyuḥ
जो आयु
आयुस्
व्याख्या
इस प्रार्थना का आरम्भ ‘भद्रम्’ से होता है—जो मंगलकारी, कल्याणकारी और हितकर हो। मन्त्र इन्द्रियों से दूर होने की नहीं, उनके उचित उन्मुख होने की कामना करता है: कान शुभ को सुनें और आँखें शुभ को देखें। ‘यजत्राः’ अर्थात पूजनीय देवों का सम्बोधन इसे प्रत्यक्ष स्तुति और भक्ति का रूप देता है। इसके बाद ‘स्थिरैरङ्गैः’—स्थिर अंगों—की छवि आती है, जिससे भीतरी सजगता और शरीर की दृढ़ता एक साथ जुड़ती है। अंतिम कामना ‘देवहितं यदायुः’ को पूरा करने की है—वह आयु जो देवों द्वारा निर्धारित या पोषित है—और वह भी स्तुति करते हुए। इस प्रकार मन्त्र का कल्याण केवल व्यक्तिगत सुख नहीं है; यह ऐसी जीवन-दृष्टि है जिसमें हमारी सुनने-देखने की क्षमता, शरीर और भक्ति सभी सही दिशा में स्थित रहें। पोस्ट में मन्त्र को बिना किसी अतिरिक्त संदर्भ के साझा किया गया है, जिससे शुभ श्रवण, शुभ दर्शन, सामर्थ्य और पूर्ण आयु की इसकी संक्षिप्त प्रार्थना स्वयं बोलती है।
स्रोत और पाठभेद
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मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥
śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।
कल्याण पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंहिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।