यजुर्वेद से सुभाषित

इस स्रोत से लिए गए 7 सुभाषित देखें।

यह स्रोत 6 विषयों में फैले 7 सुभाषित प्रदान करता है।

नवीनतम अद्यतन: 10 सित॰ 2026

संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन

बच्चों के लिए संस्कृत श्लोक
बच्चों के लिए छोटे और सरल संस्कृत श्लोक—स्पष्ट चित्र और सरल भाव वाले, देवनागरी पाठ, लिप्यंतरण तथा हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ सहित।
छोटे संस्कृत श्लोक अर्थ सहित
संग्रह के सबसे संक्षिप्त श्लोक—दो पंक्तियों के, शीघ्र कंठस्थ होने योग्य, देवनागरी पाठ, लिप्यंतरण तथा हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ सहित।
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
7 सित॰ 2026
यजुर्वेद

शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥

śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥

शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।

कल्याणप्रकृति
10 अग॰ 2026
ऋग्वेद

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhir yajatrāḥ । sthirair aṅgais tuṣṭuvāṃsas tanūbhir vyaśema devahitaṃ yad āyuḥ ॥

ऋग्वेद की यह प्रार्थना शुभ सुनने और देखने, स्थिर अंगों के साथ स्तुति करने तथा देवों द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करने की कामना करती है।

कल्याणभक्ति
5 जून 2026
ऋग्वेद

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र वायु, नदियों, औषधियों और वनस्पतियों को मधुरता, पोषण, आरोग्य और सामंजस्य के स्रोत के रूप में देखता है।

प्रकृतिसंरक्षणसामंजस्यकल्याण
22 मई 2026
ऋग्वेद

वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम। यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय॥

vanaspate śatavalśo vi roha sahasravalśā vi vayaṁ ruhema । yaṁ tvāmayaṁ svadhitistejamānaḥ praṇināya mahate saubhagāya ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र प्रकृति और मानव के गहरे सह-अस्तित्व को रेखांकित करते हुए वनस्पति के साथ-साथ समाज की प्रगति की कामना करता है।

प्रकृतिसंरक्षणकृषिकल्याण
11 मई 2026
ऋग्वेद

अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति॥

agnirmūrdhā divaḥ kakutpatiḥ pṛthivyā ayam । apāṁ retāṁsi jinvati ॥

एक वैदिक मंत्र जो अग्नि को द्युलोक की सर्वोच्च शक्ति और पदार्थ के भीतर ऊर्जा को जागृत करने वाले मूल तत्व के रूप में वर्णित करता है।

प्रकृतिऊर्जाशक्ति
10 फ़र॰ 2026
यजुर्वेद

अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चांसि सन्तु वः। नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रै पृथिव्याऽ इयन्ते राड् यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा॥

asme vo'stvindriyam asme nṛmṇam uta kratur asme varcāṃsi santu vaḥ । namo mātre pṛthivyai namo mātre pṛthivyā iyante rāḍ yantāsi yamano dhruvo'si dharuṇaḥ kṛṣyai tvā kṣemāya tvā rayyai tvā poṣāya tvā ॥

यह वैदिक प्रार्थना माता पृथ्वी को कृषि, समृद्धि, पोषण और जीवन को धारण करने वाले साधनों का स्थिर स्रोत मानकर नमन करती है।

प्रकृतिकृषिकल्याणसमृद्धि