शं नो वातः - वायु, सूर्य और वर्षा का मंगल

7 सित॰ 2026

शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥

śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥

शं नो वातः पवतां का अर्थ

हमारे लिए वायु कल्याणकारी, सुखद और शुद्ध होकर बहे, सूर्य देव हमारे लिए कल्याणकारी होकर तपे अर्थात् उनका ताप सुख देने वाला हो और दिव्य गर्जना करने वाले वरुणदेव हमारे ऊपर कल्याणकारी जल की वर्षा करें।

शब्दार्थ

शम्śam

कल्याण, मंगल या सुख

अगले व्यञ्जन से पहले इसका रूप 'शं' दिखाई देता है।

नःnaḥ

हमारे लिए

अस्मद्

पहली बार वातः से पहले इसका रूप 'नो' है।

वातःvātaḥ

वायु

वात

पवताम्pavatām

बहे

√पव्

तपतुtapatu

तपे या प्रकाश दे

√तप्

सूर्यःsūryaḥ

सूर्य

सूर्य

कनिक्रदत्kanikradat

बार-बार ध्वनि करता हुआ, गर्जता हुआ

√क्रन्द्

निरन्तर पाठ में देवः से पहले अन्तिम त् का द् हो जाता है।

देवःdevaḥ

देवता

देव

पर्जन्यःparjanyaḥ

वर्षा के देवता पर्जन्य

पर्जन्य

अभि से पहले विसर्ग का ओ होकर रूप 'पर्जन्योऽभि' बनता है।

अभिabhi

ऊपर, ओर

वर्षतुvarṣatu

वर्षा करें, बरसाएँ

√वृष्

व्याख्या

इस मन्त्र में प्रत्येक प्राकृतिक शक्ति से पहले 'शम्' की पुनरावृत्ति होती है, जो कल्याण, मंगल और सुख की कामना व्यक्त करती है। प्रार्थना है कि 'वात', अर्थात् वायु, हितकारी रूप से बहे; 'सूर्य' सुखद ताप दे; और वर्षा के देवता पर्जन्य हमारे ऊपर जल बरसाएँ। 'कनिक्रदत्' शब्द गर्जना करते हुए आते पर्जन्य का सजीव चित्र उपस्थित करता है। इस प्रकार वायु, सूर्य और वर्षा केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं रहते, बल्कि जीवन को धारण करने वाली शक्तियों के रूप में सामने आते हैं। मन्त्र में सीधे उल्लिखित प्राकृतिक शक्तियाँ 'nature' विषय को और बार-बार की गई 'शम्' की कामना 'wellness' विषय को आधार देती है। दिया गया हिन्दी अर्थ इन संक्षिप्त वैदिक कामनाओं को शुद्ध वायु, सुखद ताप और कल्याणकारी जल की आधुनिक भाषा में विस्तार देता है। ये भाव मन्त्र की मंगलकामना के अनुरूप हैं, यद्यपि हर विशेषण का संस्कृत में अलग पद नहीं है। मूल मन्त्र में गर्जना और वर्षा करने वाले देवता का नाम पर्जन्य है, वरुण नहीं; इसलिए स्रोत-सम्मत व्याख्या में यह भेद स्पष्ट किया गया है, जबकि दिया गया हिन्दी अर्थ निर्देशानुसार अक्षरशः सुरक्षित रखा गया है।

मूल पोस्ट

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यजुर्वेद से और सुभाषित

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10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
10 अग॰ 2026
ऋग्वेद

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhir yajatrāḥ । sthirair aṅgais tuṣṭuvāṃsas tanūbhir vyaśema devahitaṃ yad āyuḥ ॥

ऋग्वेद की यह प्रार्थना शुभ सुनने और देखने, स्थिर अंगों के साथ स्तुति करने तथा देवों द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करने की कामना करती है।

कल्याणभक्ति
5 जून 2026
ऋग्वेद

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र वायु, नदियों, औषधियों और वनस्पतियों को मधुरता, पोषण, आरोग्य और सामंजस्य के स्रोत के रूप में देखता है।

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23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

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अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

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ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

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