शं नो देवः सविता - सुख-समृद्धि का मंगल आह्वान

25 मई 2026

शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥

śaṃ no devaḥ savitā trāyamāṇaḥ śaṃ no bhavantūṣaso vibhātīḥ । śaṃ naḥ parjanyo bhavatu prajābhyaḥ śaṃ naḥ kṣetrasya patir astu śambhuḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

प्रकृति की असीम कृपा, सूर्यदेव की ऊर्जा और वर्षा का पावन आशीर्वाद हम सभी के जीवन को सुख-सौभाग्य से समृद्ध करता है। मेरी कामना है कि धरती पर सदैव हरियाली और खुशहाली बनी रहे।

शं नो देवः सविता का अर्थ

संसार की रक्षा करने वाले प्रकाशस्वरूप सविता देव हमारे लिए मंगलकारी हों। प्रकाशमान उषाएँ हमारे जीवन में सुख और मंगल लाएँ। वर्षा के देव पर्जन्य हमारी प्रजा का कल्याण करें और खेती, अन्न तथा भूमि के स्वामी कल्याणदाता हमें सुख-समृद्धि प्रदान करें।

शब्दार्थ

शम् नःśaṁ naḥ

हमें शान्ति

√शम्

देवः सविताdevaḥ savitā

सविता देव

√सू

त्रायमाणःtrāyamāṇaḥ

रक्षा करते हुए

√त्रै

भवन्तुbhavantu

हों

√भू

उषसःuṣasaḥ

उषाएँ

√वस्

विभातीःvibhātīḥ

प्रकाशमान

वि + √भा

पर्जन्यःparjanyaḥ

पर्जन्य

पर्जन्य

भवतुbhavatu

हो

√भू

प्रजाभ्यःprajābhyaḥ

प्रजा के लिए

प्र + √जन्

क्षेत्रस्य पतिःkṣetrasya patiḥ

क्षेत्र का स्वामी

क्षेत्र + पति

अस्तु शम्भुःastu śambhuḥ

कल्याणकारी हो

√अस् + √शम्

व्याख्या

यह मन्त्र भारतीय वांग्मय में समाहित सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) और समष्टि-कल्याण की भावना का सुंदर निदर्शन है। यहाँ चार प्रमुख प्राकृतिक शक्तियों के साथ 'शं' (कल्याण, सुख और स्थिरता) शब्द का अनुबन्ध जोड़ा गया है। 'सविता देव' सौर-ऊर्जा और जीवनशक्ति के रक्षक हैं; 'उषा' नित्य निरंतर मिलने वाले नए अवसरों और नव-ऊर्जा का प्रतीक है; 'पर्जन्य' जल-चक्र (water cycle) और वर्षा द्वारा प्रजा के पोषण को सुनिश्चित करते हैं; और 'क्षेत्रस्य पतिः' (खेतों और फसलों के अधिष्ठाता देव) मृदा (soil) की उर्वरता और खाद्य सुरक्षा के प्रतीक हैं। प्रधानमंत्री के 'हरियाली और खुशहाली' के संकल्प के संदर्भ में, यह मन्त्र यह स्पष्ट संदेश देता है कि वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रगति तब तक संभव नहीं है, जब तक मनुष्य प्रकृति के इन घटकों—सूर्य, जल और भूमि—के साथ गहरे सामंजस्य में न रहे।

मूल पोस्ट

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ऋग्वेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

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