मधु वाता ऋतायते - प्रकृति की मधुरता

5 जून 2026

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

प्रकृति का संरक्षण केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारों का भी अभिन्न हिस्सा है।

मधु वाता ऋतायते मधु का अर्थ

वायु हमारे लिए आनंददायक और कल्याणकारी रूप से प्रवाहित हो, नदियाँ जीवनदायिनी और पोषणकारी जल प्रदान करें तथा औषधियाँ और वनस्पतियाँ समस्त जीव-जगत के लिए आरोग्य और सुख का कारण बनें।

शब्दार्थ

मधुmadhu

मधु, मधुरता

मधु

वाताःvātāḥ

वायु

वात, √वा

ऋतायतेṛtāyate

ऋत का पालन करने वाले के लिए

ऋत

ऋत अर्थात् विश्वव्यवस्था; मधुरता उसी पर आश्रित है।

क्षरन्तिkṣaranti

बहती हैं

√क्षर्

सिन्धवःsindhavaḥ

नदियाँ

सिन्धु

माध्वीःmādhvīḥ

मधुमय

मधु

नःnaḥ

हमारे लिए

अस्मद्

सन्तुsantu

हों

√अस्

ओषधीःoṣadhīḥ

औषधियाँ, वनस्पतियाँ

ओषधि

व्याख्या

यह मंत्र मधु सूक्त का अंश है, जहाँ प्रकृति को 'मधु' अर्थात् मधुरता, सामंजस्य और पोषण के भाव से देखा गया है। वायु, नदियाँ, औषधियाँ और वनस्पतियाँ यहाँ निष्क्रिय संसाधन नहीं हैं, बल्कि जीवन को धारण करने वाली व्यापक व्यवस्था के सक्रिय अंग हैं। 'ऋत' शब्द सृष्टि के सत्य, संतुलित और सुव्यवस्थित प्रवाह की ओर संकेत करता है। जब वायु ऋत के अनुरूप बहे, नदियाँ पोषण दें और औषधियाँ-वनस्पतियाँ कल्याणकारी बनें, तब मानव का सुख और आरोग्य प्रकृति के संतुलन से अभिन्न रूप से जुड़ जाता है। इस दृष्टि से प्रकृति-संरक्षण केवल आधुनिक दायित्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों में निहित जीवन-दृष्टि है। यह मंत्र स्मरण कराता है कि मधुर, स्वस्थ और संतुलित जीवन तभी संभव है जब वायु, जल, वनस्पति और समूची प्रकृति सुरक्षित, शुद्ध और समृद्ध बनी रहे।

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ऋग्वेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
7 सित॰ 2026
यजुर्वेद

शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥

śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥

शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।

कल्याणप्रकृति

प्रकृति पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

स्वास्थ्यकल्याण