यावच्चतस्रः प्रदिशः - प्रकृति के साथ समृद्धि

8 जून 2026

यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते। तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥

yāvac catasraḥ pradiśaś cakṣur yāvat samaśnute । tāvat samaitv indriyaṃ mayi tad dhastivarcasam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

प्रकृति के साथ संतुलन बिठाकर समस्त जीवों का कल्याण हो, यही हमारी संस्कृति की मूल भावना रही है। इसी व्यापक दृष्टि से आज भारतवर्ष प्रगति और समृद्धि के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।

यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते का अर्थ

चारों दिशाओं के विस्तार व नेत्रों की दृष्टि-शक्ति की जागरूकता से युक्त ऐसी समृद्धि हमें प्राप्त हो, जहाँ प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन में रहकर पर्यावरण का संरक्षण हो और समस्त जीवन का सतत कल्याण सुनिश्चित हो।

शब्दार्थ

यावत्yāvat

जहाँ तक

चतस्रः प्रदिशःcatasraḥ pradiśaḥ

चारों दिशाएँ

चतुर् + प्र + √दिश्

चक्षुःcakṣuḥ

नेत्र

√चक्ष्

यावत् समश्नुतेyāvat samaśnute

जहाँ तक पहुँचता है

सम् + √अश्

तावत्tāvat

वहाँ तक

समैतुsamaitu

आ जाए

सम् + √इ

इन्द्रियम्indriyam

इन्द्रियबल

इन्द्र

मयिmayi

मुझमें

अस्मद्

तत् हस्तिवर्चसम्tad dhastivarcasam

वह हस्ति-वर्चस्

हस्तिन् + वर्चस्

व्याख्या

अथर्ववेद का यह मन्त्र प्रार्थना करता है कि जहाँ तक चारों दिशाएँ फैली हैं और नेत्र पहुँचता है, वहाँ तक का हस्ति-सदृश वर्चस् और इन्द्रियबल 'मुझमें' एकत्र हो। 'वर्चस्' तेज, ओज या प्रभाव और 'इन्द्रियम्' शक्ति का बोध देता है। हाथी उस इच्छित गरिमा और बल की उपमा है। संग्रहीत पर्यावरणीय अर्थ—प्रकृति से सन्तुलन, पर्यावरण-रक्षा और सभी जीवों का कल्याण—मन्त्र में नहीं है। वह हाथी के बिम्ब से प्रेरित आधुनिक अनुप्रयोग है; शाब्दिक प्रार्थना वक्ता के लिए व्यापक हस्ति-सदृश शक्ति की है।

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अथर्ववेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
17 अग॰ 2026
ऋग्वेद

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ । samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati ॥

ऋग्वेद का अंतिम मंत्र समान संकल्प, समान हृदय और समान मन की कामना करता है, जिससे सब परस्पर सौहार्द के साथ मिलकर रह सकें।

एकतासामंजस्य

शक्ति पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
14 जुल॰ 2026
शिव पुराण

प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥

prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥

यह संस्कृत सुभाषित सूर्य और उसके प्रकाश के माध्यम से अस्तित्व, शक्ति और अभिव्यक्ति की गहरी परस्पर निर्भरता को समझाता है।

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