सहृदयं सांमनस्यम् - एक हृदय, द्वेष से मुक्त

15 सित॰ 2026

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः का अर्थ

मनुष्य को ऐसे कर्म करने चाहिए जो हृदय में प्रेम, सौहार्द और सद्भाव को बढ़ाएँ। सभी को एक-दूसरे के प्रति उसी प्रकार स्नेह और आत्मीयता रखनी चाहिए, जिस प्रकार गाय अपने नवजात बछड़े से प्रेम करती है।

शब्दार्थ

सहृदयम्sahṛdayam

एक हृदय वाला, संवेदनशील

स + हृदय

सांमनस्यम्sāṃmanasyam

मनों का सामंजस्य, सौमनस्य

समनस्

अविद्वेषम्avidveṣam

द्वेष का अभाव

अ + वि + √द्विष्

कृणोमिkṛṇomi

मैं बनाता हूँ, स्थापित करता हूँ

√कृ

वःvaḥ

तुम्हारे लिए, तुम सबमें

युष्मद्

अन्यो अन्यम्anyo anyam

एक-दूसरे को

अन्य

अभि हर्यतabhi haryata

स्नेह करो, प्रिय मानो

अभि + √हृ

वत्सम्vatsam

बछड़े को

वत्स

जातम्jātam

नवजात, अभी जन्मे हुए

√जन्

इवiva

जैसे, के समान

अघ्न्याaghnyā

गाय, शाब्दिक रूप से जिसे हानि न पहुँचाई जाए

अ + √हन्

व्याख्या

मंत्र का आरंभ परस्पर जुड़े तीन आदर्शों से होता है: 'सहृदयम्' अर्थात एक हृदय अथवा संवेदनशील भाव, 'सांमनस्यम्' अर्थात मनों का सामंजस्य, और 'अविद्वेषम्' अर्थात आपसी द्वेष का अभाव। इसके बाद मंत्र इन सूक्ष्म गुणों को एक आत्मीय दृश्य में मूर्त करता है और मनुष्यों से कहता है कि वे एक-दूसरे को वैसे ही चाहें जैसे गाय अपने नवजात बछड़े को चाहती है। 'हर्यत' केवल संघर्ष न करने का निषेध नहीं, बल्कि एक-दूसरे को प्रिय मानने और स्नेहपूर्वक अपनाने का सक्रिय आह्वान है। 'अघ्न्या' गाय का वैदिक नाम है, जिसका शाब्दिक भाव है जिसे हानि न पहुँचाई जाए; इसलिए मातृस्नेह की इस उपमा में कोमलता के साथ संरक्षण का भाव भी जुड़ता है। दिया गया अर्थ इस शिक्षा को मनुष्य के कर्मों से जोड़ते हुए दैनिक व्यवहार में प्रेम, सौहार्द और सद्भाव बढ़ाने पर बल देता है। यह मंत्र के प्रत्यक्ष आह्वान का स्वाभाविक आधुनिक अनुप्रयोग है: जब लोग वैमनस्य के स्थान पर आत्मीयता और परस्पर आदर को सचेत रूप से चुनते हैं, तभी समुदाय में सच्चा सामंजस्य दृढ़ होता है।

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अथर्ववेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
17 अग॰ 2026
ऋग्वेद

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ । samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati ॥

ऋग्वेद का अंतिम मंत्र समान संकल्प, समान हृदय और समान मन की कामना करता है, जिससे सब परस्पर सौहार्द के साथ मिलकर रह सकें।

एकतासामंजस्य
6 अग॰ 2026
अथर्ववेद

विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥

viśvasvaṃ mātaram oṣadhīnāṃ dhruvāṃ bhūmiṃ pṛthivīṃ dharmaṇā dhṛtām । śivāṃ syonām anu carema viśvahā ॥

धर्म से धारण की गई, औषधियों की माता और मंगलमयी पृथ्वी पर सदा विचरण करने की वैदिक प्रार्थना।

प्रकृतिधर्म

एकता पर और सुभाषित

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2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
11 सित॰ 2026
गरुड पुराण

सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥

sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥

गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।

नैतिकताचरित्रसामंजस्य