मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥
mudākarāttamodakaṁ sadā vimuktisādhakaṁ kalādharāvataṁsakaṁ vilāsilokarakṣakam । anāyakaikanāyakaṁ vināśitebhadaityakaṁ natāśubhāśunāśakaṁ namāmi taṁ vināyakam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदेशवासियों को गणेश चतुर्थी की अनंत शुभकामनाएं। विघ्नहर्ता के दर्शन और पूजन का यह पावन पर्व सबके जीवन में नई ऊर्जा और नए उत्साह का संचार करे। उनके दिव्य आशीर्वाद से सभी के प्रयास सफल हों और राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता रहे, यही कामना है। गणपति बाप्पा मोरया!
मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं का अर्थ
जिनके कर-कमलों में मोदक सुशोभित है, जो सदैव मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं, जिन्होंने चंद्रमा को अपने मस्तक का आभूषण बनाया है, जो संपूर्ण जगत् के रक्षक हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड के एकमात्र स्वामी हैं, जिन्होंने गजासुर राक्षस का संहार किया और जो अपने भक्तों को समस्त कष्टों से शीघ्र ही मुक्त कर देते हैं - उन भगवान श्रीविनायक को मैं प्रणाम करता हूँ।
शब्दार्थ
- मुदाकरात्तमोदकम्mudākarāttamodakam
हाथ में आनंदपूर्वक मोदक धारण करने वाले
मुदा + करात् + मोदक
- सदाsadā
सदैव
- विमुक्तिसाधकम्vimuktisādhakam
मुक्ति को सिद्ध करने वाले
विमुक्ति + साधक
- कलाधरावतंसकम्kalādharāvataṁsakam
चंद्रमा को आभूषण के रूप में धारण करने वाले
कलाधर + अवतंसक
- विलासिलोकरक्षकम्vilāsilokarakṣakam
अभिव्यक्त जगत् के रक्षक
विलासिन् + लोक + रक्षक
- अनायकैकनायकम्anāyakaikanāyakam
नायक-विहीनों के एकमात्र नायक
अनायक + एक + नायक
- विनाशितेभदैत्यकम्vināśitebhadaityakam
इभदैत्य का विनाश करने वाले
विनाशित + इभ + दैत्यक
- नताशुभाशुनाशकम्natāśubhāśunāśakam
नमन करने वालों के अशुभ को शीघ्र नष्ट करने वाले
नत + अशुभ + आशु + नाशक
- नमामिnamāmi
मैं प्रणाम करता हूँ
√नम्
- तम्tam
उनको
- विनायकम्vināyakam
विनायक को
व्याख्या
यह श्लोक श्रीविनायक के अनेक विशेषणों की सुंदर माला रचते हुए अंत में ‘नमामि तं विनायकम्’—उन विनायक को मैं प्रणाम करता हूँ—कहता है। आनंदपूर्वक हाथ में धारण किया गया मोदक उनके सौम्य और मंगलमय स्वरूप को सामने लाता है, जबकि ‘विमुक्तिसाधकम्’ उन्हें निरंतर मुक्ति का साधन बनाने वाले के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘कलाधरावतंसकम्’ में चंद्रमा उनका आभूषण है और ‘विलासिलोकरक्षकम्’ में वे इस अभिव्यक्त जगत् के रक्षक हैं। ‘अनायकैकनायकम्’ उन्हें अनाथों या नायक-विहीनों के एकमात्र नायक के रूप में संबोधित करता है; अंतिम समास उन्हें इभदैत्य का विनाश करने वाला और नमन करने वालों के अशुभ को शीघ्र नष्ट करने वाला बताते हैं। प्रधानमंत्री के गणेश चतुर्थी संदेश में इन्हीं गुणों के आधार पर नई ऊर्जा, प्रयासों की सफलता और राष्ट्र की निरंतर प्रगति की कामना की गई है।
मूल पोस्ट
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।