सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥
sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥
प्रधानमंत्री का संदेशअगले कुछ दिनों में दुनियाभर के नेता BRICS Summit के लिए जुटेंगे। पूर्ण विश्वास है कि सम्मेलन में विश्व कल्याण की कामना के साथ विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक और सार्थक चर्चा होगी।
सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत का अर्थ
मनुष्य को सदैव सज्जनों के साथ रहना और उन्हीं की संगति करनी चाहिए। सज्जनों के साथ ही विचार-विमर्श और मैत्रीपूर्ण व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि परस्पर सद्भाव, संवाद और मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध शान्ति तथा सहयोग को सुदृढ़ करते हैं।
शब्दार्थ
- सद्भिः एवsadbhiḥ eva
केवल सज्जनों के साथ
सत्
सन्धि: सद्भिः + एव = सद्भिरेव।
- सह आसीतsaha āsīta
साथ बैठे अथवा रहे
आस्
सन्धि: सह + आसीत = सहासीत।
- सद्भिःsadbhiḥ
सज्जनों के साथ
सत्
- कुर्वीतkurvīta
करनी चाहिए
कृ
- सङ्गतिम्saṅgatim
संगति अथवा साथ
सम् + गम्
- सद्भिःsadbhiḥ
सज्जनों के साथ
सत्
- विवादम्vivādam
विचार-विमर्श, वाद या मतभेद
वि + वद्
- मैत्रीम्maitrīm
मैत्री
मित्र
- चca
और
- न असद्भिःna asadbhiḥ
असज्जनों के साथ नहीं
असत्
सन्धि: न + असद्भिः = नासद्भिः।
- किंचित् आचरेत्kiṃcit ācaret
कुछ भी आचरण अथवा व्यवहार करे
आ + चर्
सन्धि: किंचित् + आचरेत् = किंचिदाचरेत्।
व्याख्या
यह श्लोक संगति के चुनाव को सुविधा का विषय नहीं, बल्कि नैतिक आचरण का अंग बनाता है। ‘सद्भिः’, अर्थात् ‘सज्जनों के साथ’, पद की पुनरावृत्ति साथ बैठने, संगति करने, विचार-विमर्श करने और मैत्री रखने—इन सभी क्रियाओं पर बल देती है; इसके विपरीत ‘असद्भिः’ ऐसी संगति से बचने को कहता है। यहाँ ‘विवाद’ को केवल झगड़े के अर्थ में लेना आवश्यक नहीं है: सदाचारी लोगों के बीच मतभेद और तर्कपूर्ण चर्चा भी हितकारी हो सकते हैं। ‘मैत्री’ इस चित्र में आत्मीयता जोड़ती है और बताती है कि सच्चे सम्बन्ध में सौहार्द के साथ स्पष्ट संवाद भी सम्भव है। इस प्रकार ‘सत्’ और ‘असत्’ का विरोध व्यक्ति को संगति का मूल्यांकन चरित्र और आचरण के आधार पर करने की प्रेरणा देता है। साथ दिए गए संदेश में इस शिक्षा को विश्व नेताओं के सम्मेलन और विश्व कल्याण की भावना से होने वाली सार्थक चर्चा से जोड़ा गया है। यह श्लोक की एक आधुनिक कूटनीतिक प्रयुक्ति है: योग्य संगति चुनना, मतभेद होने पर भी गम्भीर संवाद करना और सद्भाव बनाए रखना। स्वयं संस्कृत पंक्तियाँ मुख्यतः यह बताती हैं कि मनुष्य किन लोगों के साथ संगति और व्यवहार करे; शान्ति और सहयोग का उल्लेख पोस्ट के प्रसंग तथा दिए गए अर्थ में विस्तृत आधुनिक निष्कर्ष के रूप में आता है।
मूल पोस्ट
गरुड पुराण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंउत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥
uttamaiḥ saha sāṅgatyaṃ paṇḍitaiḥ saha satkathām । alubdhaiḥ saha mitratvaṃ kurvāṇo nāvasīdati ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक उत्तम लोगों की संगति, विद्वानों के साथ सत्कथा और निर्लोभी लोगों से मित्रता का महत्त्व बताता है।
नैतिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।