उत्तमैः सह साङ्गत्यं - जैसी संगति, वैसा जीवन

25 अग॰ 2026

उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥

uttamaiḥ saha sāṅgatyaṃ paṇḍitaiḥ saha satkathām । alubdhaiḥ saha mitratvaṃ kurvāṇo nāvasīdati ॥

उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः का अर्थ

उत्तम व्यक्तियों की संगति, विद्वानों के साथ सत्संवाद तथा निःस्वार्थ और निर्लोभी व्यक्तियों के साथ मित्रता करने वाला व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता।

शब्दार्थ

उत्तमैःuttamaiḥ

उत्तम या श्रेष्ठ लोगों के साथ

उत्तम

सह के साथ प्रयुक्त तृतीया बहुवचन।

सहsaha

साथ

साङ्गत्यम्sāṅgatyam

संगति, साथ

सम् + √गम्

पण्डितैःpaṇḍitaiḥ

विद्वानों के साथ

पण्डित

सह के साथ प्रयुक्त तृतीया बहुवचन।

सहsaha

साथ

सत्कथाम्satkathām

अच्छी या सार्थक चर्चा

सत् + कथा

अलुब्धैःalubdhaiḥ

निर्लोभी लोगों के साथ

अ + लुब्ध

सह के साथ प्रयुक्त तृतीया बहुवचन।

सहsaha

साथ

मित्रत्वम्mitratvam

मित्रता

मित्र + त्व

कुर्वाणःkurvāṇaḥ

करने या बनाए रखने वाला

√कृ

सन्धि: कुर्वाणः + न = कुर्वाणो न।

नna

नहीं

अवसीदतिavasīdati

दुःख में डूबता, निराश या पतित होता है

अव + √सद्

व्याख्या

यह श्लोक बताता है कि मनुष्य का कल्याण उसके सम्बन्धों से भी निर्मित होता है। इसके तीन समानान्तर पदों में 'सह', अर्थात् साथ, बार-बार आता है: उत्तम लोगों की संगति करें, विद्वानों के साथ श्रेष्ठ संवाद करें और लोभ से मुक्त लोगों से मित्रता रखें। 'साङ्गत्य' केवल पास होने का नहीं, निरन्तर साथ और सम्पर्क का भाव देता है, जबकि 'सत्कथा' उपयोगी, सद्विचारपूर्ण और उन्नत करने वाली बातचीत है। 'अलुब्ध' उन लोगों को कहता है जो लोभी या स्वार्थलिप्त नहीं हैं, इसलिए यहाँ मित्रता का आधार लाभ नहीं बल्कि चरित्र है। अन्त का 'नावसीदति' बताता है कि ऐसा आचरण करने वाला व्यक्ति नीचे नहीं गिरता, हतोत्साहित नहीं होता और दुःख में डूबा नहीं रहता। यह शिक्षा गरुड पुराण के आचारकाण्ड में नीतिसार के अन्तर्गत आती है, जहाँ व्यावहारिक आचरण का विवेचन है। महासुभाषितसंग्रह ६४९७ में यही श्लोक 'सत्कथाम्' के स्थान पर 'संकथाम्', अर्थात् परस्पर संवाद, पाठ के साथ मिलता है। दोनों पाठ एक ही बात को पुष्ट करते हैं: हमारी संगति में लोगों का चरित्र, विवेक और लोभ से मुक्ति हमारे अपने जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं।

मूल पोस्ट

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गरुड पुराण से और सुभाषित

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29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि

ज्ञान पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।

नैतिकताशांतिविद्याअनुशासन