ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥
jñānavṛddhān praśaṃsantaḥ śuśrūṣantaḥ parasparam । vinivṛttābhisandhānāḥ sukhamedhanti sarvaśaḥ ॥
ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः का अर्थ
ज्ञानी और सज्जन व्यक्ति परस्पर सम्मान, सेवा और सद्भाव का व्यवहार करते हैं। वे व्यक्तिगत लाभ की भावना से मुक्त होकर एक-दूसरे की सेवा तथा प्रशंसा करते हुए जीवन में सुखपूर्वक उन्नति प्राप्त करते हैं।
शब्दार्थ
- ज्ञानवृद्धान्jñānavṛddhān
ज्ञान में परिपक्व लोगों को
ज्ञान + वृद्ध
प्रशंसन्तः का कर्म, द्वितीया बहुवचन।
- प्रशंसन्तःpraśaṃsantaḥ
सम्मान या प्रशंसा करते हुए
प्र + √शंस्
- शुश्रूषन्तःśuśrūṣantaḥ
ध्यानपूर्वक सुनते या सेवा करते हुए
√श्रु
सुनने, आज्ञापालन करने अथवा सेवा करने की इच्छा बताने वाला सन्नन्त कृदन्त।
- परस्परम्parasparam
एक-दूसरे को, परस्पर
परस्पर
- विनिवृत्ताभिसन्धानाःvinivṛttābhisandhānāḥ
छिपी मंशाओं या विरोधी योजनाओं से निवृत्त
वि + नि + √वृत्; अभि + सम् + √धा
- सुखम्sukham
सुखपूर्वक
सुख
क्रियाविशेषणवत् द्वितीया; एधन्ति के साथ सन्धि होकर सुखमेधन्ति बनता है।
- एधन्तिedhanti
वे बढ़ते या समृद्ध होते हैं
√एध्
- सर्वशःsarvaśaḥ
सब प्रकार से, चारों ओर
सर्व
व्याख्या
यह श्लोक उस आचरण का वर्णन करता है जिससे लोग मिलकर सुखपूर्वक उन्नति करते हैं। 'प्रशंसन्तः' के द्वारा 'ज्ञानवृद्धान्', अर्थात् ज्ञान में परिपक्व लोगों, का सम्मान करने को कहा गया है, जबकि 'शुश्रूषन्तः परस्परम्' एक-दूसरे की ध्यानपूर्वक सेवा करने अथवा एक-दूसरे को सुनने की तत्परता व्यक्त करता है। 'विनिवृत्ताभिसन्धानाः' एक आवश्यक नैतिक शर्त जोड़ता है: वे छिपे हुए प्रयोजन, विरोधी मंशा या स्वार्थपूर्ण योजनाएँ छोड़ चुके हैं। फल केवल भौतिक वृद्धि नहीं है, क्योंकि 'सुखम् एधन्ति' कहता है कि वे सुखपूर्वक और सब प्रकार से फलते-फूलते हैं। इस प्रकार ज्ञान का सम्मान, पारस्परिकता, सेवा और कपटपूर्ण मंशा का त्याग सामूहिक कल्याण की एक ही साधना के अंग बनते हैं। महाभारत के प्रसंग में इस वाक्य का अध्याहृत कर्ता संगठित गण अथवा समुदाय हैं, और आसपास का संवाद बताता है कि ऐसे समूह एकजुट रहकर कैसे उन्नति करते हैं। दिया गया अर्थ इस शिक्षा को ज्ञानी और सज्जन व्यक्तियों के सामान्य आचरण के रूप में प्रस्तुत करता है, जो इसका स्वाभाविक आधुनिक अनुप्रयोग है। उसमें 'विनिवृत्ताभिसन्धानाः' को व्यक्तिगत लाभ की भावना से मुक्ति कहा गया है; अधिक शाब्दिक रूप से यह छिपी मंशाओं अथवा षड्यन्त्रपूर्ण योजनाओं से निवृत्त लोगों को बताता है। स्रोत का पाठ 'ज्ञानवृद्धान् प्रशंसन्तः', यानी ज्ञान में वृद्ध लोगों का सम्मान करते हुए, है; वह 'ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति', यानी ज्ञानवृद्ध प्रशंसा करते हैं, नहीं है।
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।