विज्ञानसारथिर्यस्तु - संयमित सारथि

1 जुल॰ 2026

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥

vijñānasārathir yastu manaḥ pragrahavān naraḥ । so'dhvanaḥ pāram āpnoti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

डिजिटल इंडिया के 11 वर्षों की सफलता से भारतवर्ष को दुनियाभर में एक नई पहचान मिली है। इससे इनोवेशन और टेक्नोलॉजी को अपनाकर देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की देशवासियों की संकल्पशक्ति का पता चलता है।

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः का अर्थ

वह मनुष्य जिसकी विवेकपूर्ण बुद्धि वैज्ञानिक सारथि के समान जागरूक हो और जिसका मन संयमित हो, वह जीवन-पथ की जटिलताओं को पार कर परम लक्ष्य तक पहुँच जाता है।

शब्दार्थ

विज्ञानसारथिःvijñānasārathiḥ

विज्ञान को सारथि बनाए

वि + √ज्ञा + सारथि

यः तुyas tu

जो

यद्

मनःप्रग्रहवान्manaḥpragrahavān

मन को लगाम बनाए

मनस् + प्र + √ग्रह्

नरःnaraḥ

मनुष्य

नर

सः अध्वनःso'dhvanaḥ

वह मार्ग के

अध्वन्

पारम् आप्नोतिpāram āpnoti

पार पहुँचता है

पार + √आप्

तत् विष्णोःtad viṣṇoḥ

वह विष्णु का

विष्णु

परमम् पदम्paramaṁ padam

परम पद

परम + पद

व्याख्या

यह मंत्र कठोपनिषद् के प्रसिद्ध रथ-रूपक का अंश है। उस रूपक में शरीर रथ है, आत्मा रथी है, बुद्धि सारथि है, मन लगाम है और इन्द्रियाँ घोड़े हैं। यहाँ 'विज्ञान' का अर्थ विवेकपूर्ण ज्ञान या जागरूक समझ है: सारथि को मार्ग भी जानना होता है, घोड़ों की गति भी समझनी होती है और लगाम भी स्थिर रखनी होती है। 'मनः प्रग्रहवान्' उस व्यक्ति को बताता है जिसका मन बिखरा हुआ नहीं, बल्कि संयमित है; इसलिए ज्ञान और आत्मानुशासन साथ मिलकर जीवन को दिशा देते हैं। 'तद्विष्णोः परमं पदम्' यहाँ परम लक्ष्य या सर्वोच्च अवस्था की ओर संकेत करता है। मूल उपनिषद्-संदर्भ में यह मंत्र आत्मबोध और मुक्ति की दिशा दिखाता है, केवल सांसारिक सफलता की नहीं। प्रधानमंत्री मोदी के संदेश में इसका आधुनिक नागरिक अर्थ सामने आता है: इनोवेशन और टेक्नोलॉजी तभी देश को ऊँचाइयों तक ले जाती हैं जब वे स्पष्ट विवेक, संयमित संकल्प और बड़े उद्देश्य से संचालित हों।

मूल पोस्ट

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कठोपनिषद् से और सुभाषित

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13 जन॰ 2026
कठोपनिषद्

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥

uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān nibodhata । kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathas tat kavayo vadanti ॥

कठोपनिषद् साधक को उठने, जागने, ज्ञानी गुरु के पास जाने और आत्मबोध के सूक्ष्म तथा कठिन मार्ग पर चलने का आह्वान करता है।

आत्मज्ञानविद्यामार्गदर्शनदृढ़ता

विद्या पर और सुभाषित

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7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

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कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

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विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता