कठोपनिषद् से सुभाषित

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नवीनतम अद्यतन: 1 जुल॰ 2026

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1 जुल॰ 2026
कठोपनिषद्

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥

vijñānasārathir yastu manaḥ pragrahavān naraḥ । so'dhvanaḥ pāram āpnoti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam ॥

कठोपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि विवेकपूर्ण ज्ञान जब सारथि बनता है और मन संयमित रहता है, तब साधक जीवन-पथ पार कर परम लक्ष्य तक पहुँचता है।

विद्याअनुशासनआत्मज्ञानसफलता
13 जन॰ 2026
कठोपनिषद्

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥

uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān nibodhata । kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathas tat kavayo vadanti ॥

कठोपनिषद् साधक को उठने, जागने, ज्ञानी गुरु के पास जाने और आत्मबोध के सूक्ष्म तथा कठिन मार्ग पर चलने का आह्वान करता है।

आत्मज्ञानविद्यामार्गदर्शनदृढ़ता