विद्या पर सुभाषित
यह विषय 6 स्रोतों से आए 38 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 6 अक्टू॰ 2026
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥
aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ । sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का श्लोक: कुशल व्यक्ति छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार ग्रहण करे, जैसे भ्रमर अनेक पुष्पों से मधु लेता है।
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।
ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥
jñānavṛddhān praśaṃsantaḥ śuśrūṣantaḥ parasparam । vinivṛttābhisandhānāḥ sukhamedhanti sarvaśaḥ ॥
महाभारत का यह श्लोक ज्ञानवृद्धों के सम्मान, परस्पर सेवा और छिपे स्वार्थ के त्याग को सामूहिक सुख एवं उन्नति का आधार बताता है।
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥
विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥
ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र करने वाला नहीं; योग से सिद्ध साधक उसे समय आने पर अपने भीतर पाता है।
प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा। शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥
prerakaḥ sūcakaścaiva vācako darśakastathā । śikṣakaḥ bodhakaścaiva ṣaḍete guravaḥ smṛtāḥ ॥
कुलार्णव तन्त्र गुरु के छह स्वरूप बताता है—प्रेरणा देने वाला, संकेत करने वाला, समझाने वाला, दिखाने वाला, शिक्षा देने वाला और बोध कराने वाला।
धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्। लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा॥
dhanyānām uttamaṃ dākṣyaṃ dhanānām uttamaṃ śrutam । lābhānāṃ śreya ārogyaṃ sukhānāṃ tuṣṭir uttamā ॥
महाभारत के यक्षप्रश्न का यह श्लोक बताता है कि कौशल, विद्या, आरोग्य और संतोष जीवन की श्रेष्ठ संपदाएँ हैं।
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः। नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम्॥
jayanti te sukṛtino rasasiddhāḥ kavīśvarāḥ । nāsti yeṣāṃ yaśaḥkāye jarāmaraṇajaṃ bhayam ॥
भर्तृहरि के नीतिशतकम् का यह श्लोक रससिद्ध कवीश्वरों के उस यश की बात करता है जो जरा और मृत्यु से परे है।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥
vijñānasārathir yastu manaḥ pragrahavān naraḥ । so'dhvanaḥ pāram āpnoti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam ॥
कठोपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि विवेकपूर्ण ज्ञान जब सारथि बनता है और मन संयमित रहता है, तब साधक जीवन-पथ पार कर परम लक्ष्य तक पहुँचता है।
शास्त्रे प्रतिष्ठा सहजश्च बोधः प्रागल्भ्यमभ्यस्तगुणा च वाणी। कालानुरोधः प्रतिभानवत्त्वमेते गुणाः कामदुघाः क्रियासु॥
śāstre pratiṣṭhā sahajaśca bodhaḥ prāgalbhyam abhyastaguṇā ca vāṇī । kālānurodhaḥ pratibhānavattvam ete guṇāḥ kāmadughāḥ kriyāsu ॥
भवभूति के मालतीमाधवम् का यह श्लोक उन छह गुणों का वर्णन करता है जो मानव-प्रयास को फलदायी बनाकर लक्ष्य तक पहुंचाते हैं।
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
satyānusāriṇī lakṣmīḥ kīrtis tyāgānusāriṇī । abhyāsasāriṇī vidyā buddhiḥ karmānusāriṇī ॥
यह सुभाषित धन को सत्यनिष्ठा, यश को परोपकार, ज्ञान को अभ्यास और बुद्धि को कर्म से जोड़ता है।
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥
yogena cittasya padena vācāṃ malaṃ śarīrasya ca vaidyakena । yo'pākarot taṃ pravaraṃ munīnāṃ patañjaliṃ prāñjalir ānato'smi ॥
महर्षि पतञ्जलि को समर्पित यह पारंपरिक मंगलाचरण मन के लिए योग, वाणी के लिए व्याकरण और शरीर के लिए आयुर्वेद की शुद्धिकारक भूमिका बताता है।
श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था सङ्क्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता। यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव॥
śliṣṭā kriyā kasyacid ātmasaṃsthā saṅkrāntir anyasya viśeṣayuktā । yasyobhayaṃ sādhu sa śikṣakāṇāṃ dhuri pratiṣṭhāpayitavya eva ॥
यह श्लोक उस दुर्लभ शिक्षक की प्रशंसा करता है जिसमें स्वयं निपुण होने की क्षमता और दूसरों तक ज्ञान-कौशल पहुँचाने की योग्यता, दोनों साथ हों।
अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुले भूतलेऽखिले। शस्त्रे शास्त्रे त्रिचतुराश्चतुरा यदि मादृशाः॥
anantodbhūtabhūtaughasaṅkule bhūtale'khile । śastre śāstre tricaturāś caturā yadi mādṛśāḥ ॥
यह श्लोक उस विरले व्यक्तित्व की वंदना करता है जो शस्त्र (शौर्य) और शास्त्र (ज्ञान) दोनों में समान रूप से निपुण हो।
आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः। अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छुद्धो भवत्ययम्॥
ātmā śuddhaḥ sadā nityaḥ sukharūpaḥ svayaṃprabhaḥ । ajñānān malino bhāti jñānāc chuddho bhavaty ayam ॥
दर्शनोपनिषद् का यह मंत्र आत्मा के नित्य, शुद्ध और स्वयंप्रकाश स्वरूप को बताते हुए अज्ञान के आवरण को ज्ञान से दूर करने की प्रेरणा देता है।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau । jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ॥
भगवद्गीता का यह ऐतिहासिक श्लोक प्रतिपादित करता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय व्यक्तिगत इच्छा के बजाय एक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित व्यवस्था पर आधारित होना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥
yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥
जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।
शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः। अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्॥
śīlaṁ parahitāsaktiḥ anutsekaḥ kṣamā dhṛtiḥ । alobhaśceti vidyāyāḥ paripākojjvalaṁ phalam ॥
विद्या की पूर्णता केवल ज्ञान संचय में नहीं, बल्कि शील, परोपकार और धैर्य जैसे गुणों के विकास में है। यह श्लोक विद्या के वास्तविक स्वरूप को परिभाषित करता है।
अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च यत्परम्। तदेव सर्वसंसारसारं सद्भिरुपास्यते॥
antaḥsthameva yajjñānaṁ jñānādapi ca yatparam । tadeva sarvasaṁsārasāraṁ sadbhirupāsyate ॥
यह श्लोक उस आंतरिक ज्ञान का वर्णन करता है जो बाहरी शिक्षा से परे है और जिसे संपूर्ण संसार का वास्तविक सार माना गया है।
श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि। संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः॥
śriyaḥ pradugdhe vipado ruṇaddhi yaśāṃsi sūte malinaṃ pramārṣṭi । saṃskāraśauchena paraṃ punīte śuddhā hi buddhiḥ kila kāmadhenuḥ ॥
यह सुभाषित संस्कारित और शुद्ध बुद्धि की शक्ति का गुणगान करता है, और इसकी तुलना कामधेनु से करता है जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥
ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥
ऋग्वेद की यह सार्वभौमिक प्रार्थना हमें चारों दिशाओं से शुभ और प्रेरणादायक विचारों को ग्रहण करने की प्रेरणा देती है।
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥
vipro vṛkṣas tasya mūlaṃ ca sandhyā vedāḥ śākhā dharmakarmāṇi patram । tasmāt mūlaṃ yatnato rakṣaṇīyaṃ chinne mūle naiva śākhā na patram ॥
एक ज्ञानी व्यक्ति की तुलना वृक्ष से करते हुए यह श्लोक नित्य उपासना के महत्त्व को दर्शाता है, जो ज्ञान और कर्म का आधार है।
अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः। आरम्भः कर्मणां शश्वदारब्धस्यान्तदर्शनम्॥
avijñātasya vijñānaṃ vijñātasya ca niścayaḥ । ārambhaḥ karmaṇāṃ śaśvadārabdhasyāntadarśanam ॥
अज्ञात की खोज, ज्ञात का निश्चय, कार्य का दृढ़ आरंभ और उसे पूर्ण करना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥
श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञान और अनुभूत बोध का उपदेश देते हैं, जिसके बाद साधक के लिए जानने योग्य कोई आवश्यक सत्य शेष नहीं रहता।
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥
śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇāṃ tathā । ūhāpoho’rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ ॥
परिपक्व बुद्धि उत्सुकता से सुनती, अर्थ ग्रहण और धारण करती, तर्कपूर्वक विचार करती, भ्रम त्यागती और सत्य पहचानती है।
दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा॥
dāne tapasi śaurye ca vijñāne vinaye naye । vismayo na hi kartavyo bahuratnā vasundharā ॥
यह संसार इतना विशाल है कि दान, तप, शौर्य, ज्ञान, विनय या नीति में किसी को स्वयं को अद्वितीय नहीं मानना चाहिए।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam । chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit ॥
संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष और वेदों के ज्ञान को समझाता यह गीता का श्लोक अध्यात्म की गहरी समझ प्रदान करता है।
विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया। यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते॥
vidyā vitarko vijñānaṃ smṛtis tatparatā kriyā । yasyaite ṣaḍguṇās tasya nāsādhyam ativartate ॥
विद्या, तर्क, विवेकपूर्ण ज्ञान, स्मृति, तत्परता और सक्रिय प्रयास मिलकर व्यक्ति को कठिन कार्य सिद्ध करने का व्यावहारिक सामर्थ्य देते हैं।
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥
anantaśāstraṃ bahulāśca vidyāḥ alpaśca kālo bahuvighnatā ca । yatsārabhūtaṃ tadupāsanīyaṃ haṃso yathā kṣīramivāmbumadhyāt ॥
शास्त्र विशाल और जीवन अल्प है, इसलिए विवेकी व्यक्ति हंस की भाँति ज्ञान के सार को चुनकर ग्रहण करता है।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān nibodhata । kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathas tat kavayo vadanti ॥
कठोपनिषद् साधक को उठने, जागने, ज्ञानी गुरु के पास जाने और आत्मबोध के सूक्ष्म तथा कठिन मार्ग पर चलने का आह्वान करता है।
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥
guṇo bhūṣayate rūpaṁ śīlaṁ bhūṣayate kulam । siddhir bhūṣayate vidyāṁ bhogo bhūṣayate dhanam ॥
रूप की शोभा गुणों से है, कुल की सदाचार से, विद्या की सफलता से और धन की शोभा उसके सदुपयोग से है।
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः। स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥
jñānaṁ viraktiḥ aiśvaryam śauryaṁ tejo balaṁ smṛtiḥ । svātantryaṁ kauśalaṁ kāntiḥ dhairyaṁ mārdavaṁ eva ca ॥
ज्ञान, वैराग्य, सामर्थ्य, शौर्य, तेज, धैर्य और कोमलता जैसे पूरक गुण मिलकर एक परिपक्व चरित्र का निर्माण करते हैं।