सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
satyānusāriṇī lakṣmīḥ kīrtis tyāgānusāriṇī । abhyāsasāriṇī vidyā buddhiḥ karmānusāriṇī ॥
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः का अर्थ
धन सत्यनिष्ठा का अनुसरण करता है, यश परोपकार का अनुसरण करता है, ज्ञान अभ्यास का अनुसरण करता है और बुद्धि कार्यान्वयन का अनुसरण करती है।
शब्दार्थ
- सत्यानुसारिणीsatyānusāriṇī
सत्य का अनुसरण करने वाली
सत्य + अनु + √सृ
- लक्ष्मीःlakṣmīḥ
लक्ष्मी
√लक्ष्
- कीर्तिःkīrtiḥ
कीर्ति
√कॄ
- त्यागानुसारिणीtyāgānusāriṇī
त्याग का अनुसरण करने वाली
√त्यज् + अनु + √सृ
- अभ्याससारिणीabhyāsasāriṇī
अभ्यास का अनुसरण करने वाली
अभि + √अस् + √सृ
- विद्याvidyā
विद्या
√विद्
- बुद्धिःbuddhiḥ
बुद्धि
√बुध्
- कर्मानुसारिणीkarmānusāriṇī
कर्म का अनुसरण करने वाली
√कृ + अनु + √सृ
व्याख्या
यह सुभाषित चार महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि उन गुणों का फल बताता है जो उन्हें स्थायी बनाते हैं। लक्ष्मी अर्थात् धन और समृद्धि सत्य तथा ईमानदार आचरण का अनुसरण करती है, जबकि कीर्ति त्याग, उदारता और परोपकार से जन्म लेती है। विद्या को अभ्याससारिणी कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि निरंतर अभ्यास के बिना ज्ञान केवल सूचना बनकर रह जाता है। अंतिम संबंध विचार को कर्मभूमि में ले आता है: बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है, क्योंकि कार्यान्वयन के दौरान ही समझ की परीक्षा होती है और वह परिपक्व बनती है। इस प्रकार श्लोक बिना आधार के फल पाने की प्रवृत्ति को चुनौती देता है। सत्यनिष्ठा, परोपकार, नियमित अभ्यास और सक्रिय कर्म ही क्रमशः समृद्धि, यश, ज्ञान और व्यावहारिक बुद्धि को सार्थक तथा टिकाऊ बनाते हैं।
मूल पोस्ट
सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
समृद्धि पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।