कर्मणा मनसा वाचा - अभ्यास से बनता व्यक्तित्व

24 जुल॰ 2026

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥

karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं का अर्थ

मनुष्य अपने कर्मों, विचारों और वचनों के द्वारा जिस किसी भी विषय का निरन्तर अभ्यास करता है, वही अन्ततः उसके व्यक्तित्व को ढालकर उसे उसी दिशा में खींच ले जाता है, इसलिए मनुष्य को सदैव अपने चिंतन और संवाद में केवल कल्याणकारी विषयों को ही स्थान देना चाहिए।

शब्दार्थ

कर्मणाkarmaṇā

कर्म से

कर्मन्, √कृ

मनसाmanasā

मन से

मनस्, √मन्

वाचाvācā

वाणी से

वाच्, √वच्

यत्yat

जो कुछ

यद्

अभीक्ष्णम्abhīkṣṇam

निरन्तर, बार-बार

अभीक्ष्ण

निषेवतेniṣevate

सेवन करता है, अभ्यास करता है

नि + √सेव्

तत् एवtad eva

वही

तद् + एव

अपहरतिapaharati

हर लेता है, अपनी ओर खींच लेता है

अप + √हृ

एनम्enam

उसको

एनद्

तस्मात्tasmāt

इसलिए

तद्

कल्याणम्kalyāṇam

कल्याण, शुभ

कल्याण

आचरेत्ācaret

आचरण करना चाहिए

आ + √चर्

विधिलिङ्—यह विधान है, वर्णन नहीं।

व्याख्या

यह श्लोक बार-बार किए गए अभ्यास को व्यक्तित्व और जीवन-दिशा को गढ़ने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें ‘कर्मणा’, ‘मनसा’ और ‘वाचा’—कर्म, विचार और वाणी—तीनों को साथ रखकर बताया गया है कि मनुष्य केवल अपने बाहरी आचरण से नहीं, बल्कि निरन्तर दोहराए जाने वाले मानसिक और वाचिक संस्कारों से भी बनता है। ‘अभीक्ष्णम्’ का अर्थ बार-बार या निरन्तर है, जबकि ‘निषेवते’ किसी विषय का अभ्यास करने, उसे अपनाने अथवा उसमें लगे रहने का भाव देता है। जिसका लगातार सेवन किया जाता है, वही अन्ततः मनुष्य को अपने साथ बहा ले जाता है—यही ‘अपहरति’ का प्रभावशाली संकेत है। इसलिए विदुर का निष्कर्ष सीधा है: ‘कल्याणमाचरेत्’, अर्थात कल्याणकारी आचरण का अभ्यास करना चाहिए। यह शिक्षा बताती है कि नैतिक जीवन केवल कभी-कभार किए गए अच्छे संकल्प से नहीं, बल्कि प्रतिदिन सोची, कही और की जाने वाली बातों के अनुशासन से बनता है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

कर्म पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस