कर्म पर संस्कृत श्लोक

इन श्लोकों में कर्म का अर्थ भाग्य नहीं है। कर्म अर्थात् क्रिया—मनुष्य मन, वचन और शरीर से बार-बार जो करता है, और उससे जो परिणाम निकलता है। संस्कृत परंपरा इस विषय को असाधारण व्यावहारिकता से देखती है: विदुर चेतावनी देते हैं कि जिसका हम निरंतर अभ्यास करते हैं वही हमारा स्वरूप बन जाता है, अर्थशास्त्र स्पष्ट कहता है कि अनुत्थान से निश्चित नाश होता है, और कथासरित्सागर सुविचारित प्रयत्न की तुलना उस बीज से करता है जो फ़सल बनकर लौटता है।

ये श्लोक महाभारत, विदुर नीति, ऐतरेय ब्राह्मण, अर्थशास्त्र, पंचतंत्र तथा अन्य नीति साहित्य से लिए गए हैं। हर श्लोक के पूर्ण पृष्ठ पर हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, प्रमाणित स्रोत और व्याख्या उपलब्ध है।

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

निरंतर परिश्रम के अनुशासन से लेकर कर्म के फल तक—प्रयत्न, उसके परिणाम और बहुत करने तथा भली प्रकार करने के अंतर पर श्लोक।

1

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥

karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥

अर्थ

मनुष्य अपने कर्मों, विचारों और वचनों के द्वारा जिस किसी भी विषय का निरन्तर अभ्यास करता है, वही अन्ततः उसके व्यक्तित्व को ढालकर उसे उसी दिशा में खींच ले जाता है, इसलिए मनुष्य को सदैव अपने चिंतन और संवाद में केवल कल्याणकारी विषयों को ही स्थान देना चाहिए।

2

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

अर्थ

जो व्यक्ति अपनी दृष्टि, विचार, वाणी और कर्मों के माध्यम से लोगों का हृदय जीत लेता है, वह ही उनके विश्वास, सम्मान और सद्भाव का पात्र बनता है।

3

इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥

itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥

अर्थ

जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज यदि उचित समय पर जल से सींचा जाए तो समय के साथ भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्पों के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी मनुष्य को महान सफलता प्रदान करता है।

4

अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥

anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥

अर्थ

जो व्यक्ति परिश्रम नहीं करता, उसकी अवनति निश्चित होती है। उसे जो कुछ पहले से प्राप्त होता है, वह भी नष्ट हो जाता है और जो आगे प्राप्त होने वाला होता है, वह कभी प्राप्त नहीं होता। परंतु जो मनुष्य पुरुषार्थ करता है, वही जीवन में धन, समृद्धि और सफलता को प्राप्त करता है।

5

यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥

yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥

अर्थ

जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार नवाचार में बिना प्रयास के सफलता संभव नहीं होती। प्रतिभा तभी फलित होती है जब उसे परिश्रम और निरंतर कर्म का साथ मिलता रहे।

6

हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥

hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥

अर्थ

मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो और स्वयं की आत्मा के लिए शांति देने वाला हो। ईश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण भी यही है, क्योंकि यही मार्ग समस्त पुरुषार्थों और सिद्धियों का मूल आधार है।

7

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥

nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥

अर्थ

जो मनुष्य निरन्तर प्रयत्नशील रहता है, वह समृद्धि प्राप्त करता है, किंतु जो निष्क्रिय होकर बैठा रहता है, वह प्रगति से वंचित रह जाता है। निरन्तर प्रयत्न करने वाले का भाग्य भी साथ देता है इसलिए निरन्तर कर्म करते रहो और आगे बढ़ते रहो।

8

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥

caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥

अर्थ

चलते हुए को अर्थात् क्रियाशील व्यक्ति को ही संसार में उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति होती, जैसे निरंतर गतिमान सूर्य को श्रेय की प्राप्ति होती। अतः हमेशा क्रियाशील रहना चाहिए।

9

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate । hitaṃ ca nābhyasūyanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

अर्थ

जो व्यक्ति सदैव श्रेष्ठ एवं सदाचारपूर्ण कर्मों में लगा रहता है, निरंतर उन्नति और लोककल्याण के कार्यों में संलग्न रहता है तथा दूसरों के हितकारी वचनों और कार्यों का सम्मान करता है, उनसे द्वेष नहीं करता, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है।

10

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

अर्थ

चाहे कार्य बहुत बड़ा हो या छोटा-जिसे मनुष्य करना चाहता है, उसे पूर्ण समर्पण तथा नए उत्साह के साथ करना चाहिए, यही एक गुण सिंह से सीखने योग्य है।

11

न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः। यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च॥

na tathā balavīryābhyāṁ jayanti vijigīṣavaḥ । yathā satyānṛśaṁsyābhyāṁ dharmeṇaivodyamena ca ॥

अर्थ

विजय की इच्छा रखने वाले लोग वैसी विजय बल और पराक्रम से प्राप्त नहीं करते, जैसी विजय वे सत्य, दया, कर्तव्य और निरंतर प्रयत्न के द्वारा प्राप्त कर लेते हैं।

12

सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥

satyānusāriṇī lakṣmīḥ kīrtis tyāgānusāriṇī । abhyāsasāriṇī vidyā buddhiḥ karmānusāriṇī ॥

अर्थ

धन सत्यनिष्ठा का अनुसरण करता है, यश परोपकार का अनुसरण करता है, ज्ञान अभ्यास का अनुसरण करता है और बुद्धि कार्यान्वयन का अनुसरण करती है।