प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
प्रधानमंत्री का संदेशआज भारत को पहली हाइड्रोजन ट्रेन मिलने का सपना साकार होने जा रहा है। यह आत्मनिर्भर भारत और सतत विकास की दिशा में एक बहुत बड़ा दिन है। मैं इससे जुड़े सभी लोगों को बहुत बधाई देता हूं।
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः का अर्थ
चाहे कार्य बहुत बड़ा हो या छोटा-जिसे मनुष्य करना चाहता है, उसे पूर्ण समर्पण तथा नए उत्साह के साथ करना चाहिए, यही एक गुण सिंह से सीखने योग्य है।
शब्दार्थ
- प्रभूतम्prabhūtam
बड़ा
प्र + √भू
- कार्यम्kāryam
कार्य
√कृ
- अल्पम् वाalpaṁ vā
अथवा छोटा
अल्प
- यत्yat
जिसे
यद्
- नरःnaraḥ
मनुष्य
नर
- कर्तुम् इच्छतिkartum icchati
करना चाहता है
√कृ + √इष्
- सर्वारम्भेणsarvārambheṇa
पूर्ण उद्यम से
सर्व + आ + √रभ्
- तत् कार्यम्tat kāryam
वह करना चाहिए
√कृ
- सिंहात्siṁhāt
सिंह से
सिंह
- एकम्ekam
यह एक बात
एक
- प्रचक्षतेpracakṣate
सीखने योग्य कहते हैं
प्र + √चक्ष्
व्याख्या
यह श्लोक प्रकृति के एक परिचित दृश्य को कर्म की नीति में बदल देता है। सिंह शिकार के आकार के अनुसार अपना ध्यान या बल कम नहीं करता; काम छोटा हो या बड़ा, वह पूरी शक्ति और एकाग्रता से आगे बढ़ता है। यहाँ ‘सर्वारम्भेण’ शब्द महत्वपूर्ण है, जो बताता है कि कार्य को पूरी तैयारी, ऊर्जा और समर्पण के साथ आरम्भ करना चाहिए। चाणक्य का संदेश व्यावहारिक है: किसी कर्म का महत्व केवल उसके आकार से नहीं, बल्कि उसे निभाने की गंभीरता से भी तय होता है। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन के संदर्भ में यह श्लोक बड़े सार्वजनिक प्रयासों की उसी भावना को रेखांकित करता है—सावधानीपूर्वक तैयारी, निरंतर पुरुषार्थ और कठिन लक्ष्य के सामने भी नया उत्साह।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंजलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥
yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥
जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंरत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।