चरैवेति चरैवेति - निरंतरता का संदेश

21 जन॰ 2026

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥

caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आज नॉर्थ ईस्ट के तीन राज्य मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा अपना स्थापना दिवस मना रहे हैं। इस अवसर पर यहां के अपने सभी भाई-बहनों को मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं। अपने प्रयासों से जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें सफलता मिले, यही कामना है।

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु का अर्थ

चलते रहो, आगे बढ़ते रहो, सतत कर्मशील व्यक्ति ही प्रगति का मीठा फल प्राप्त करता है। सूर्य की महानता को देखो, वह बिना थके और बिना क्षीण हुए, संसार को अपनी ऊर्जा से निरंतर प्रकाशित करता है।

शब्दार्थ

चरcara

चल

√चर्

एवeva

ही

इतिiti

इस प्रकार

चरन्caran

चलता हुआ

√चर्

वैvai

निश्चय ही

मधुmadhu

मधु

मधु

विन्दतिvindati

पाता है

√विद्

सूर्यस्यsūryasya

सूर्य की

सूर्य

पश्यpaśya

देखो

√दृश्

श्रेमाणम्śremāṇam

महिमा

श्री

न मामारna māmāra

वह मरा नहीं

√मृ

न जीर्यतिna jīryati

न ही जीर्ण होता है

√जॄ

निरन्तर गति का फल—और प्रायः यही अंश छूट जाता है।

व्याख्या

यह श्लोक ऐतरेय ब्राह्मण के प्रसिद्ध 'चरैवेति' सूक्त का है। इसमें इंद्र, राजा रोहित को बार-बार आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। यहाँ सूर्य को कर्मठता के सर्वोच्च उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है—वह कभी सोता नहीं, कभी थकता नहीं, और उसकी निरंतर गति ही उसकी महिमा का आधार है। यह हमें संदेश देता है कि जो रुक गया उसकी प्रगति रुक गई, और जो चलता रहा वही जीवन के ‘मधु’ (सच्ची सफलता और आनंद) को प्राप्त करता है। साझा अर्थ सूर्य को संसार का प्रकाशक बताता है, जबकि मूल पंक्ति 'न मामार न जीर्यति' कहती है—वह न मरता है, न जीर्ण होता है। श्लोक का तर्क यही है कि निरंतर गति ही क्षय और थकान से मुक्ति देती है।

मूल पोस्ट

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ऐतरेय ब्राह्मण से और सुभाषित

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2 जुल॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥

nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥

ऐतरेय ब्राह्मण की चरैवेति परंपरा का यह मंत्र बताता है कि समृद्धि निरंतर प्रयत्न करने वाले को मिलती है, निष्क्रिय रहने वाले को नहीं।

दृढ़ताअनुशासनसफलताकर्म
13 फ़र॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥

caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥

गतिशील रहने और कर्मठता का संदेश देता यह श्लोक बताता है कि सूर्य की तरह निरंतर चलते रहने वाला ही यश प्राप्त करता है।

दृढ़ताकर्मअनुशासनऊर्जा

दृढ़ता पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
25 सित॰ 2026
योगवासिष्ठ

यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥

yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥

योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासफलता