दशपुत्रसमा कन्या - एक कन्या दस पुत्रों के समान

22 जन॰ 2026

दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्। यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥

daśaputrasamā kanyā daśaputrān pravardhayan । yat phalam labhate martyastal labhyaṁ kanyayaikayā ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

कन्या को लक्ष्मी मानने वाले हमारे देश में 11 साल पहले आज ही के दिन बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत हुई थी। यह बड़े गर्व की बात है कि आज भारत की बेटियां हर क्षेत्र में नित-नए रिकॉर्ड बना रही हैं।

दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन् का अर्थ

एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है। जो पुण्यफल एक व्यक्ति को दस पुत्रों के पालन-पोषण से प्राप्त होता है, वही फल उसे केवल एक कन्या के पालन-पोषण से मिल जाता है।

शब्दार्थ

दशपुत्रसमाdaśaputrasamā

दस पुत्रों के समान

दशन् + पुत्र + सम

कन्याkanyā

कन्या

कन्या

दशपुत्रान्daśaputrān

दस पुत्रों को

दशन् + पुत्र

प्रवर्धयन्pravardhayan

पालता-पोसता हुआ

प्र + √वृध्

यत् फलम्yat phalam

जो फल

यद् + फल

लभतेlabhate

प्राप्त करता है

√लभ्

मर्त्यःmartyaḥ

मनुष्य

√मृ

तत्tat

वह

तद्

लभ्यम्labhyam

प्राप्य है

√लभ्

कन्यया एकयाkanyayaikayā

एक ही कन्या से

कन्या + एक

व्याख्या

यह श्लोक सामाजिक पूर्वाग्रह का उत्तर एक जानबूझकर प्रभावशाली तुलना से देता है—एक पुत्री दस पुत्रों के समान है। इसकी भाषा अपने समय की पुण्य-धारणा में बात करती है, पर इसका मुख्य आशय स्पष्ट है कि पुत्री को कम मूल्यवान नहीं माना जा सकता। यह कथन परिवार के दायित्व को भी रेखांकित करता है, क्योंकि पुण्य को उसके स्नेहपूर्ण पालन-पोषण से जोड़ा गया है। आज के संदर्भ में यह श्लोक बालिकाओं के सम्मान, शिक्षा, स्नेह और समान अवसर का समर्थन करता है। इसकी स्थायी सार्थकता पुत्र-पुत्री की संख्या गिनने में नहीं, बल्कि उनके बीच किसी ऊँच-नीच को अस्वीकार करने में है।

मूल पोस्ट

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स्कन्द पुराण से और सुभाषित

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16 जुल॰ 2026
स्कन्द पुराण

देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत। पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥

devadeva jagannātha surāsuranamaskṛta । puṇyaślokāvyayānanta paramātman namo’stu te ॥

भगवान जगन्नाथ को देवताओं के भी देव, जगत के स्वामी और सभी हृदयों में स्थित परमात्मा मानकर किया गया भक्तिपूर्ण प्रणाम।

भक्तिआध्यात्मिकता
9 जन॰ 2026
स्कन्द पुराण

आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥

ādināthena śarveṇa sarvaprāṇihitāya vai । ādyatattvānyathānīyaṁ kṣetrametanmahāprabham । prabhāsitaṁ mahādevi yatra siddhyanti mānavāḥ ॥

भगवान शिव के आदिनाथ रूप द्वारा जन-कल्याण हेतु प्रकट किया गया प्रभास क्षेत्र, जहाँ दिव्यता और सिद्धि का वास है।

आध्यात्मिकताआत्मज्ञानधर्मभक्ति

नारीशक्ति पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस