आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥
ādināthena śarveṇa sarvaprāṇihitāya vai । ādyatattvānyathānīyaṁ kṣetrametanmahāprabham । prabhāsitaṁ mahādevi yatra siddhyanti mānavāḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशपावन-पुनीत सोमनाथ धाम की भव्य विरासत सदियों से जन-जन की चेतना को जागृत करती आ रही है। यहां से निकलने वाली दिव्य ऊर्जा युग-युगांतर तक आस्था, साहस और स्वाभिमान का दीप प्रज्वलित करती रहेगी।
आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै का अर्थ
हे महादेवी! आदिनाथ स्वरूप भगवान शिव ने सभी प्राणियों के कल्याण के लिए अपने परम तत्त्व से प्रभावशाली प्रभास खंड को प्रकट किया है। यह क्षेत्र दैवी तेज से प्रकाशित है, जहां मनुष्य सिद्धि, पुण्य, तथा मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
शब्दार्थ
- आदिनाथेनādināthena
आदिनाथ के द्वारा
आदि + नाथ
- शर्वेणśarveṇa
शर्व अर्थात् शिव के द्वारा
शर्व
- सर्वप्राणिहितायsarvaprāṇihitāya
समस्त प्राणियों के हित के लिए
सर्व + प्राणिन् + हित
- वैvai
निश्चय ही
- आद्यतत्त्वानिādyatattvāni
आदि तत्त्व
आद्य + तत्त्व
- क्षेत्रम्kṣetram
यह क्षेत्र
क्षेत्र
- एतत्etat
यह
एतद्
- महाप्रभम्mahāprabham
महान् प्रभा वाला
महा + प्रभा
- प्रभासितम्prabhāsitam
प्रकाशित
प्र + √भास्
- महादेविmahādevi
हे महादेवी
महा + देवी
- यत्रyatra
जहाँ
- सिद्ध्यन्तिsiddhyanti
सिद्धि पाते हैं
√सिध्
- मानवाःmānavāḥ
मनुष्य
मनु
व्याख्या
यह श्लोक सोमनाथ से जुड़े पवित्र प्रभास क्षेत्र की महिमा का वर्णन करता है और उसे भगवान शिव द्वारा समस्त प्राणियों के हित के लिए स्थापित स्थान बताता है। ‘सर्वप्राणिहिताय’ पद स्पष्ट करता है कि इस तीर्थ का उद्देश्य निजी लाभ नहीं, व्यापक कल्याण है। इसकी प्रभा केवल बाहरी प्रकाश नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक वातावरण भी है जिसमें मनुष्य ‘सिद्धि’, अर्थात साधनामय जीवन की पूर्णता, प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार श्लोक तीर्थयात्रा को करुणा से निर्मित पवित्र परिवेश के साक्षात्कार के रूप में देखता है। किसी तीर्थ की सार्थकता केवल उसके भूगोल में नहीं, बल्कि उस आंतरिक परिवर्तन और सर्वहित की भावना में है जिसे वह जागृत करता है।
मूल पोस्ट
स्कन्द पुराण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदेवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत। पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥
devadeva jagannātha surāsuranamaskṛta । puṇyaślokāvyayānanta paramātman namo’stu te ॥
भगवान जगन्नाथ को देवताओं के भी देव, जगत के स्वामी और सभी हृदयों में स्थित परमात्मा मानकर किया गया भक्तिपूर्ण प्रणाम।
दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्। यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥
daśaputrasamā kanyā daśaputrān pravardhayan । yat phalam labhate martyastal labhyaṁ kanyayaikayā ॥
एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है, यह श्लोक एक कन्या के पालन-पोषण के पुण्य को समझाता है।
आध्यात्मिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।