सूर्यो देवो दिवं गच्छेत् - उत्तरायण की महिमा

14 जन॰ 2026

सूर्यो देवो दिवं गच्छेत् मकरस्थो रविः प्रभुः। उत्तरायणे महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥

sūryo devo divaṃ gacchet makarastho raviḥ prabhuḥ । uttarāyaṇe mahāpuṇyaṃ sarvapāpapraṇāśanam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

संक्रांति के इस पावन अवसर को देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार मनाया जाता है। मैं सूर्यदेव से सबके सुख-सौभाग्य और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं।

सूर्यो देवो दिवं गच्छेत् का अर्थ

जब प्रभु सूर्य देव मकर राशि में स्थित होकर (उत्तरी) आकाश की ओर गमन करते हैं, तब उत्तरायण का वह समय अत्यंत पुण्यकारी और समस्त पापों का नाश करने वाला होता है।

शब्दार्थ

सूर्यः देवःsūryo devaḥ

सूर्य देव

√सू

दिवम्divam

द्युलोक की ओर

दिव्

गच्छेत्gacchet

जाएँ

√गम्

मकरस्थःmakarasthaḥ

मकर राशि में स्थित

मकर + √स्था

रविः प्रभुःraviḥ prabhuḥ

प्रभु रवि

रवि

उत्तरायणेuttarāyaṇe

उत्तरायण में

उत्तर + √अय्

महापुण्यम्mahāpuṇyam

महापुण्य

महा + पुण्य

सर्वपापप्रणाशनम्sarvapāpapraṇāśanam

समस्त पापों का नाशक

सर्व + पाप + प्र + √नश्

व्याख्या

यह श्लोक मकर राशि में सूर्य की स्थिति को पुण्यकारी उत्तरायण काल से जोड़ता है। 'गच्छेत्' विधिलिङ् है, इसलिए इसका अर्थ 'जाएँ' है; 'दिवम्' द्युलोक या आकाश है, पर पहली पंक्ति स्वयं 'उत्तरी आकाश' नहीं कहती। संग्रहीत अर्थ में उत्तर की भावना 'उत्तरायणे' और मकर संक्रान्ति की पारम्परिक पृष्ठभूमि से आती है। 'सर्वपापप्रणाशनम्' इस अवसर को सभी पापों का नाशक बताता है। दान, स्नान और अनुशासन पर्व के पारम्परिक आचरण हैं, श्लोक में गिनाई गई क्रियाएँ नहीं। इसका स्रोत अभी अनुसन्धेय है, अतः सटीक वाक्य-विन्यास की पुष्टि अपेक्षित है।

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