अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु। अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु॥
asmākam indraḥ samṛteṣu dhvajeṣv asmākaṁ yā iṣavas tā jayantu । asmākaṁ vīrā uttare bhavantv asmā̃ u devā avatā haveṣu ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदुर्गम स्थलों से लेकर बर्फीली चोटियों तक हमारी सेना का शौर्य और पराक्रम हर देशवासी को गौरवान्वित करने वाला है। सरहद की सुरक्षा में डटे जवानों का हृदय से अभिनंदन!
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या का अर्थ
हे देवों! हमारे वीर और हमारा ध्वज सदैव विजयी रहें। हमारे योद्धा अडिग, साहसी और श्रेष्ठ बने रहें। आप हमें अपने आशीर्वाद और सुरक्षा में हमेशा रखें!
शब्दार्थ
- अस्माकम्asmākam
हमारा
अस्मद्
- इन्द्रःindraḥ
इन्द्र
इन्द्र
- समृतेषुsamṛteṣu
संघर्षों अथवा युद्धों में
सम् + √ऋ
- ध्वजेषुdhvajeṣu
ध्वजाओं के
ध्वज
- याः इषवःyā iṣavaḥ
जो बाण
इषु
- ताः जयन्तुtā jayantu
वे विजयी हों
√जि
- वीराःvīrāḥ
वीर
वीर
- उत्तरेuttare
श्रेष्ठ
उद् + तर
- भवन्तुbhavantu
हों
√भू
- अस्मान्asmān
हमें
अस्मद्
- देवाःdevāḥ
हे देवगण
√दिव्
- अवतavata
रक्षा करो
√अव्
- हवेषुhaveṣu
आह्वानों में
√हु
व्याख्या
ऋग्वेद के दसवें मण्डल का यह मन्त्र 'अप्रतिरथ सूक्त' का हिस्सा है, जिसे अजेयता प्रदान करने वाली प्रार्थना माना जाता है। यह वीरता (शौर्य) और दिव्यता (आशीर्वाद) के समन्वय का संदेश देता है। यह केवल भौतिक विजय की नहीं, बल्कि नैतिक और श्रेष्ठता की विजय की कामना करता है। भारतीय संस्कृति में सेना को केवल रक्षक नहीं, बल्कि धर्म और सत्य का संरक्षक माना गया है, और यह श्लोक उसी गौरवशाली भावना को प्रतिबिंबित करता है। साझा अर्थ सामान्य रूप से 'हे देवों' कहकर आरम्भ होता है, जबकि ऋचा विशेष रूप से इन्द्र को 'हमारा' कहती है और 'इषवः' अर्थात् बाणों की विजय की कामना करती है। यह ऋचा अप्रतिरथ सूक्त की है, जिसका पाठ युद्ध से पूर्व किया जाता था।
स्रोत और पाठभेद
यह श्लोक यहाँ भी उपलब्ध है
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।