दुर्लभान्यपि कार्याणि - निरंतर प्रयास की शक्ति

16 जन॰ 2026

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिद्ध्यन्ति प्रोद्यमेन हि। शिलाऽपि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः॥

durlabhāny api kāryāṇi siddhyanti prodyamena hi । śilā'pi tanutāṁ yāti prapātenārṇaso muhuḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

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दुर्लभान्यपि कार्याणि सिद्ध्यन्ति का अर्थ

कठिन से कठिन कार्य भी निरंतर उद्यम से सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार लगातार जल गिरने से कठोर चट्टान भी घिस जाती है और उस पर निशान पड़ जाते हैं।

शब्दार्थ

दुर्लभानिdurlabhāni

दुर्लभ

दुस् + √लभ्

अपिapi

भी

कार्याणिkāryāṇi

कार्य

√कृ

सिद्ध्यन्तिsiddhyanti

सिद्ध होते हैं

√सिध्

प्रोद्यमेनprodyamena

प्रबल उद्यम से

प्र + उद् + √यम्

हिhi

निश्चय ही

शिलाśilā

शिला

शिला

तनुताम्tanutām

क्षीणता को

तनु

यातिyāti

प्राप्त होती है

√या

प्रपातेनprapātena

गिरने से

प्र + √पत्

अर्णसःarṇasaḥ

जल के

अर्णस्

मुहुःmuhuḥ

बार-बार

व्याख्या

यह सुभाषित एक सुंदर प्राकृतिक उदाहरण के माध्यम से निरंतरता (Persistence) के महत्व को समझाता है। चट्टान प्रकृति के सबसे कठोर पदार्थों में से एक है, जबकि जल कोमल और प्रवाहमयी होता है। लेकिन जब जल की धारा बार-बार और लगातार एक ही स्थान पर गिरती है, तो वह पत्थर को भी तराश देती है। इसी प्रकार, 'प्रोद्यम' यानी महान और निरंतर प्रयास में वह शक्ति है जो उन बाधाओं को दूर कर सकती है जो शुरू में अभेद्य लगती हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि सफलता केवल योग्यता से नहीं, बल्कि अटूट धैर्य और निरंतर कर्म से प्राप्त होती है। यह उस अधिक परिचित बूँद-और-घट वाले श्लोक का प्रतिबिम्ब है। वहाँ बूँदें संचित होती हैं और पात्र भरता है; यहाँ जल घटाता है, और जो क्षीण होती है वह शिला है। धैर्य को दो भिन्न सामर्थ्य दिए जा रहे हैं, और यह श्लोक कठिनतर वाला कहता है—कि निरन्तर प्रयत्न निर्माण ही नहीं करता, बाधाओं को घिसकर समाप्त भी करता है। 'मुहुः' अर्थात् बार-बार, वही क्रियाविशेषण है जिस पर दोनों चित्र वस्तुतः टिके हैं। इस श्लोक का स्रोत अभी अनुसन्धेय है।

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दृढ़ता पर और सुभाषित

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1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

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दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

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दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
25 सित॰ 2026
योगवासिष्ठ

यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥

yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥

योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासफलता