एकाग्रताथ सङ्कल्पः स्नायुवद् वर्द्धनक्षमौ। नित्याभ्यासप्रयोगाभ्याम् अधिकाधिकमृध्यतः॥
ekāgratātha saṅkalpaḥ snāyuvad varddhanakṣamau । nityābhyāsaprayogābhyām adhikādhikamṛdhyataḥ ॥
एकाग्रताथ सङ्कल्पः स्नायुवद् वर्द्धनक्षमौ का अर्थ
एकाग्रता और संकल्प हमारे स्नायुतन्त्र की भाँति हैं, जिन्हें नियमित अभ्यास और सही दिशा में प्रयत्न के माध्यम से निरन्तर विकसित और सशक्त बनाया जा सकता है। समय के साथ ये दोनों और अधिक दृढ़ तथा प्रभावशाली बनते जाते हैं।
शब्दार्थ
- एकाग्रताekāgratā
एकाग्रता
एक + अग्र
- अथatha
तथा
- सङ्कल्पःsaṅkalpaḥ
संकल्प
सम् + √कॢप्
- स्नायुवत्snāyuvat
स्नायु के समान
स्नायु
- वर्द्धनक्षमौvarddhanakṣamau
दोनों बढ़ाए जाने योग्य
√वृध् + √क्षम्
- नित्याभ्यासप्रयोगाभ्याम्nityābhyāsaprayogābhyām
नित्य अभ्यास और प्रयोग से
नित्य + अभि + √अस् + प्र + √युज्
- अधिकाधिकम्adhikādhikam
अधिकाधिक
अधिक
- ऋध्यतःṛdhyataḥ
दोनों बढ़ते हैं
√ऋध्
व्याख्या
यह सुभाषित एकाग्रता और संकल्प को जन्मजात अथवा अपरिवर्तनीय गुण नहीं, बल्कि साधना से विकसित होने वाली क्षमताओं के रूप में देखता है। ‘स्नायुवत्’ की उपमा इस विचार को सहज बनाती है: जैसे नियमित व्यायाम से स्नायु सशक्त होते हैं, वैसे ही बार-बार किए गए सचेत अभ्यास से मन का ध्यान और इच्छाशक्ति दृढ़ होती है। ‘नित्याभ्यास’ निरंतर साधना की ओर संकेत करता है, जबकि ‘प्रयोग’ बताता है कि अभ्यास को सही दिशा में वास्तविक कर्म से जोड़ना आवश्यक है। इस प्रकार एकाग्रता और संकल्प दोनों ‘अधिकाधिक’, अर्थात क्रमशः और अधिक, विकसित होते जाते हैं। संदेश आश्वस्त करने वाला है, क्योंकि इसके अनुसार आरम्भ में पूर्ण ध्यान या अटूट इच्छाशक्ति होना आवश्यक नहीं है। नियमित रूप से अभ्यास की ओर लौटना, अपने संकल्प को उचित कर्म में लगाना और धैर्यपूर्वक आगे बढ़ना ही समय के साथ सामर्थ्य को बढ़ाता है।
मूल पोस्ट
महासुभाषितसंग्रह से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।
अनुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।