कारुण्येनात्मनो मानं - आत्मसंयम के चार उपाय

24 अग॰ 2026

कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥

kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

करुणा से आत्म-सम्मान और संतोष से सच्ची खुशी मिलती है। इसी भाव से समाज में सहयोग और सद्भाव की डोर और सशक्त होती है।

कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च का अर्थ

दूसरों के प्रति करुणा भाव रखने से आत्म-सम्मान प्राप्त होता है और सन्तोषी होने से तृष्णा पर विजय प्राप्त होती है। पुरुषार्थ द्वारा आलस्य तथा वितर्क अर्थात् आधारहीन आशङ्काओं पर निश्चय ही विजय प्राप्त करें।

शब्दार्थ

कारुण्येनkāruṇyena

करुणा से

कारुण्य

तृतीया एकवचन; आत्मनः के साथ सन्धि होकर कारुण्येनात्मनो बनता है।

आत्मनःātmanaḥ

अपने

आत्मन्

मानम्mānam

मान, अभिमान

मान

तृष्णाम्tṛṣṇām

तृष्णा, लोभ

तृष्णा

चca

और

परितोषतःparitoṣataḥ

सन्तोष से

परि + √तुष्

उत्थानेनutthānena

पुरुषार्थ से, प्रयत्न द्वारा

उद् + √स्था

जयेत्jayet

जीतना चाहिए

√जि

विधिलिङ्, प्रथम पुरुष एकवचन; तन्द्रीम् के साथ सन्धि होकर जयेत्तन्द्रीम् बनता है।

तन्द्रीम्tandrīm

आलस्य, तन्द्रा

तन्द्री

वितर्कम्vitarkam

वितर्क, आधारहीन आशङ्का

वि + √तर्क्

निश्चयात्niścayāt

दृढ़ निश्चय से

निस् + √चि

जयेत् के साथ सन्धि होकर निश्चयाज्जयेत् बनता है।

जयेत्jayet

जीतना चाहिए

√जि

व्याख्या

चार उपायों की समानान्तर रचना इस छोटे से अंश को आत्मसंयम का व्यावहारिक सूत्र बनाती है। 'कारुण्य', अर्थात् करुणा, अपने 'मान' या अभिमान का प्रतिकार है; 'परितोष', अर्थात् सन्तोष, निरन्तर बढ़ती 'तृष्णा' को शान्त करता है। 'उत्थान' उठ खड़े होने, उद्योग और सक्रिय पुरुषार्थ का भाव रखता है, जो 'तन्द्री' यानी आलस्य अथवा शिथिलता को जीतता है। अन्त में 'निश्चय', दृढ़ निर्णय, 'वितर्क' यानी संशयपूर्ण ऊहापोह का उत्तर है। इस प्रकार प्रत्येक दुर्बलता को केवल दबाने के बजाय उसके अनुकूल सद्गुण विकसित करने का मार्ग बताया गया है। प्रस्तुत उद्धरण महाभारत १२.२६६.१० के उत्तरार्ध और १२.२६६.११ के पूर्वार्ध को जोड़ता है; महासुभाषितसंग्रह ९७१२ में भी यही संयुक्त रूप मिलता है। दिए गए अर्थ और पोस्ट में 'मान' को सकारात्मक आत्म-सम्मान के रूप में पढ़ा गया है, जो करुणा से प्राप्त होता है। किन्तु महाभारत के मूल वाक्य-विन्यास में पहली पंक्ति पर भी अध्याहृत 'जयेत्', जीतना चाहिए, लागू होता है; अतः अधिक शाब्दिक भाव है कि करुणा से अपने अभिमान को जीतें। पोस्ट इस आन्तरिक साधना को समाज में सहयोग और सद्भाव से जोड़ता है, जबकि संस्कृत अंश स्वयं चार व्यक्तिगत दुर्बलताओं और उनके चार उपायों पर केन्द्रित है।

मूल पोस्ट

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महाभारत से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

नैतिकता पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

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निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

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दृढ़तासाहस