महासुभाषितसंग्रह से सुभाषित
यह स्रोत 6 विषयों में फैले 24 सुभाषित प्रदान करता है।
नवीनतम अद्यतन: 29 सित॰ 2026
संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।
उपदिशति लोकवृत्तं वितरति वित्तं विनोदयति चित्तम्। उत्तम्भयति महत्त्वं विद्या हृद्या सुराजसेवेव॥
upadiśati lokavṛttaṁ vitarati vittaṁ vinodayati cittam । uttambhayati mahattvaṁ vidyā hṛdyā surājaseveva ॥
हरिहर विद्या को लोक-व्यवहार, समृद्धि, प्रसन्नता और महत्त्व प्रदान करने वाली बताते हैं।
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥
aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ । sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का श्लोक: कुशल व्यक्ति छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार ग्रहण करे, जैसे भ्रमर अनेक पुष्पों से मधु लेता है।
अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥
महाभारत का यह श्लोक अभय देने वाले की प्रशंसा करता है और तीनों लोकों में प्राण के समान किसी दान को नहीं मानता।
उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥
uttamaiḥ saha sāṅgatyaṃ paṇḍitaiḥ saha satkathām । alubdhaiḥ saha mitratvaṃ kurvāṇo nāvasīdati ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक उत्तम लोगों की संगति, विद्वानों के साथ सत्कथा और निर्लोभी लोगों से मित्रता का महत्त्व बताता है।
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥
kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥
महाभारत का यह उपदेश करुणा से मान, सन्तोष से तृष्णा, पुरुषार्थ से आलस्य और निश्चय से वितर्क को जीतने की राह दिखाता है।
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा॥
etāvaj janmasāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu । prāṇair arthair dhiyā vācā śreya evācaret sadā ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का यह श्लोक कहता है कि जन्म तब सार्थक होता है जब मनुष्य प्राण, धन, बुद्धि और वाणी से सदा दूसरों का कल्याण करे।
उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥
udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥
महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥
cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥
विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥
विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।
किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥
kiṃ candramāḥ pratyupakāralipsayā karoti gobhiḥ kumudāvabodhanam । svabhāva evonnatacetasāṃ satāṃ paropakāravyasanaṃ hi jīvitam ॥
चन्द्रमा बिना प्रत्युपकार की इच्छा के कुमुदिनी को जगाता है; वैसे ही सज्जनों के लिए परोपकार जीवन का स्वाभाविक भाव है।
आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती। तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते॥
ātmodayaḥ parajānir dvayaṁ nītir itīyatī । tadūrīkṛtya kṛtibhir vācaspatyaṁ pratāyate ॥
माघ के शिशुपालवध का यह श्लोक नीति को अपने उत्थान और प्रतिपक्षी की हानि के दो स्पष्ट पक्षों में रखता है।
एकाग्रताथ सङ्कल्पः स्नायुवद् वर्द्धनक्षमौ। नित्याभ्यासप्रयोगाभ्याम् अधिकाधिकमृध्यतः॥
ekāgratātha saṅkalpaḥ snāyuvad varddhanakṣamau । nityābhyāsaprayogābhyām adhikādhikamṛdhyataḥ ॥
एकाग्रता और संकल्प स्थिर गुण नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास और सार्थक प्रयोग से स्नायुओं की तरह निरंतर विकसित होने वाली क्षमताएँ हैं।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥
भगवद् गीता का यह श्लोक तेजस्विता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अहंकाररहित विनम्रता जैसे छह दैवी गुणों का वर्णन करता है।
अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुले भूतलेऽखिले। शस्त्रे शास्त्रे त्रिचतुराश्चतुरा यदि मादृशाः॥
anantodbhūtabhūtaughasaṅkule bhūtale'khile । śastre śāstre tricaturāś caturā yadi mādṛśāḥ ॥
यह श्लोक उस विरले व्यक्तित्व की वंदना करता है जो शस्त्र (शौर्य) और शास्त्र (ज्ञान) दोनों में समान रूप से निपुण हो।
उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत। यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां जयं वदेत्॥
udīrṇamanaso yodhā vāhanāni ca bhārata । yasyāṁ bhavanti senāyāṁ dhruvaṁ tasyāṁ jayaṁ vadet ॥
महाभारत से लिया गया यह श्लोक बताता है कि उत्साहित सैनिक और उत्कृष्ट संसाधन ही किसी सेना की जीत को सुनिश्चित करते हैं।
उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥
utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥
विदुर नीति का यह श्लोक उन्नति के उन सात आधारभूत स्तंभों का वर्णन करता है जो व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य हैं।
इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥
itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥
जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी महान सफलता दिलाता है।
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक एक बुद्धिमान व्यक्ति के गुणों का वर्णन करता है: आत्मज्ञान, दृढ़ निश्चय, सहनशीलता और प्रलोभनों से ऊपर उठकर जनकल्याण के मार्ग पर अडिग रहना।
अभीप्सां स्वात्मनो रक्षाऽविरतं सुस्थिरं तया। यत्नमातिष्ठ धैर्येण ततः सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्॥
abhīpsāṁ svātmano rakṣā’virataṃ susthiraṁ tayā । yatnam ātiṣṭha dhairyeṇa tataḥ siddhir bhaved dhruvam ॥
दृढ़ संकल्प, धैर्यपूर्ण प्रयास और आत्मसंयम श्रेष्ठ अभिलाषा की रक्षा करते हुए उसे सफलता तक पहुँचाते हैं।
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्। अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः॥
gopāyitāraṁ dātāraṁ dharmanityamatandritam । akāmadveṣasaṁyuktam anurajyanti mānavāḥ ॥
आदर्श शासक रक्षा और पोषण करता है, कर्तव्य में स्थिर रहता है और प्रजा के साथ निष्पक्ष तथा संयमित शासन करता है।
एतदेव परं शौर्यं यत् परप्राणरक्षणम्। नहि प्राणहरः शूरः शूरः प्राणप्रदोऽर्थिनाम्॥
etadeva paraṁ śauryaṁ yat paraprāṇarakṣaṇam । nahi prāṇaharaḥ śūraḥ śūraḥ prāṇaprado'rthinām ॥
सच्ची वीरता प्राण लेने में नहीं, बल्कि प्राणों की रक्षा करने में है। यह श्लोक एक सच्चे वीर को संकट में पड़े लोगों को जीवन देने वाले के रूप में परिभाषित करता है।