उपदिशति लोकवृत्तम् - विद्या के वरदान

9 सित॰ 2026

उपदिशति लोकवृत्तं वितरति वित्तं विनोदयति चित्तम्। उत्तम्भयति महत्त्वं विद्या हृद्या सुराजसेवेव॥

upadiśati lokavṛttaṁ vitarati vittaṁ vinodayati cittam । uttambhayati mahattvaṁ vidyā hṛdyā surājaseveva ॥

उपदिशति लोकवृत्तं वितरति वित्तं का अर्थ

विद्या मनुष्य को लोक-व्यवहार की समझ देती है, ज्ञान व समृद्धि प्रदान करती है, उसके मन को आह्लादित करती है तथा महत्त्व को बढ़ाती है। इसलिए विद्या सुशासन की सेवा के समान हृदय को प्रिय और जीवन को उन्नत बनाने वाली है।

शब्दार्थ

उपदिशतिupadiśati

सिखाती है, निर्देश देती है

उप + √दिश्

लोकवृत्तंlokavṛttaṁ

समाज का व्यवहार और रीति

लोक + वृत्त

वितरतिvitarati

बाँटती है, प्रदान करती है

वि + √तॄ

वित्तंvittaṁ

धन, साधन

वित्त

विनोदयतिvinodayati

आनन्दित करती है

वि + √नुद्

चित्तम्cittam

मन, हृदय

चित्त

उत्तम्भयतिuttambhayati

ऊपर उठाती है, सहारा देती है

उद् + √स्तम्भ्

महत्त्वंmahattvaṁ

महानता, प्रतिष्ठा

महत्

विद्याvidyā

विद्या, शिक्षा

√विद्

हृद्याhṛdyā

हृदय को प्रिय, मनोहर

हृद्

सुराजसेवेवsurājaseveva

सुयोग्य राजा की सेवा के समान

सु + राजन् + सेवा + इव

सन्धि: सुराजसेवा + इव

व्याख्या

हरिहर ने यहाँ विद्या को केवल शास्त्रीय ज्ञान न मानकर उसके अनेक व्यावहारिक फलों के माध्यम से समझाया है। वह ‘लोकवृत्तम्’, अर्थात् संसार और समाज के व्यवहार की रीति, सिखाती है; साथ ही जीवन-निर्वाह के साधन देती और चित्त को प्रसन्न करती है। ‘उत्तम्भयति’ में ऊपर उठाने और सहारा देने का भाव है, इसलिए विद्या मनुष्य के महत्त्व और प्रतिष्ठा को भी बढ़ाती है। अन्तिम उपमा में विद्या को ‘हृद्या’, यानी हृदय को प्रिय, और सुयोग्य राजा की सेवा के समान बताया गया है, जहाँ समझ, लाभ, संतोष और प्रतिष्ठा एक साथ मिल सकते हैं। इस प्रकार श्लोक विद्या के भीतरी और बाहरी दोनों प्रभावों को जोड़ता है: वह मन को आनन्द देती है और व्यक्ति को समाज में समर्थ बनाती है। सुशासन की सेवा का उल्लेख यहाँ विद्या के बहुविध लाभों की उपमा है, कोई पृथक राजनीतिक निर्देश नहीं।

मूल पोस्ट

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हरिहरसुभाषितम् से और सुभाषित

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29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि

शिक्षा पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि