तेजः क्षमा धृतिः - दैवी सम्पदा के लक्षण

29 मई 2026

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

विनम्रता, क्षमाशीलता और उत्तम आचरण ही व्यक्तित्व के सच्चे आभूषण हैं। इन गुणों के साथ ही आज देशवासी विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि में निरंतर जुटे हैं।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो का अर्थ

तेजस्विता, क्षमाशीलता, अदम्य धैर्य, आचरण की पवित्रता, राष्ट्रहित के प्रति निष्कपट भाव तथा अहंकाररहित व्यक्तित्व ये सभी गुण दैवी सम्पदा को प्राप्त व्यक्तित्व के लक्षण कहे गए हैं।

शब्दार्थ

तेजःtejaḥ

तेज

√तिज्

क्षमाkṣamā

क्षमा

√क्षम्

धृतिःdhṛtiḥ

धृति

√धृ

शौचम्śaucam

शौच

√शुच्

अद्रोहःadrohaḥ

अद्रोह

अ + √द्रुह्

न अतिमानिताnātimānitā

अत्यधिक अभिमान का अभाव

अति + √मन्

भवन्तिbhavanti

होते हैं

√भू

सम्पदम्sampadam

सम्पदा

सम् + √पद्

दैवीम्daivīm

दैवी

देव

अभिजातस्यabhijātasya

उसके लिए जो उसमें जन्मा है

अभि + √जन्

भारतbhārata

हे भारत

व्याख्या

यह श्लोक गीता की दैवी सम्पदा का वर्णन करता है। 'तेजः' तेज या ओज, 'क्षमा' सहनशीलता, 'धृतिः' धैर्य, 'शौचम्' पवित्रता, 'अद्रोहः' द्वेष का अभाव और 'नातिमानिता' अत्यधिक अभिमान से मुक्ति है। ये गुण शक्ति को संयम और गरिमा को विनम्रता के साथ रखते हैं। संग्रहीत अर्थ में राष्ट्र के प्रति समर्पण आधुनिक अनुप्रयोग है, पर वह 'अद्रोहः' का अनुवाद नहीं; इस पद का शाब्दिक योगदान द्वेषरहितता है। सार्वजनिक जीवन से इसका सम्बन्ध उचित है, किन्तु राष्ट्र-निर्माण श्लोक में नहीं कहा गया।

मूल पोस्ट

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भगवद् गीता से और सुभाषित

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7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

चरित्र पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

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साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

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यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

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विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता