श्लिष्टा क्रिया कस्यचित् - निपुणता और शिक्षण-कौशल

1 जून 2026

श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था सङ्क्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता। यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव॥

śliṣṭā kriyā kasyacid ātmasaṃsthā saṅkrāntir anyasya viśeṣayuktā । yasyobhayaṃ sādhu sa śikṣakāṇāṃ dhuri pratiṣṭhāpayitavya eva ॥

श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था का अर्थ

कुछ लोग स्वयं किसी कार्य को करने में बहुत निपुण होते हैं, जबकि कुछ अन्य लोग उस ज्ञान या कौशल को दूसरों तक बहुत अच्छी तरह पहुँचाने में विशेष योग्य होते हैं। जिस व्यक्ति में ये दोनों गुण, खुद में निपुणता और दूसरों को सिखाने की क्षमता, निहित हों, उसे ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों की श्रेणी में सबसे आगे स्थान दिया जाना चाहिए।

शब्दार्थ

श्लिष्टाśliṣṭā

सुसम्बद्ध, निपुण

√श्लिष्

क्रियाkriyā

क्रिया

√कृ

कस्यचित्kasyacit

किसी की

किम्

आत्मसंस्थाātmasaṁsthā

स्वयं में स्थित

आत्मन् + सम् + √स्था

सङ्क्रान्तिःsaṅkrāntiḥ

सङ्क्रमण, दूसरे तक पहुँचाना

सम् + √क्रम्

अन्यस्यanyasya

दूसरे की

अन्य

विशेषयुक्ताviśeṣayuktā

विशेषता से युक्त

विशेष + √युज्

यस्यyasya

जिसमें

यद्

उभयम्ubhayam

दोनों

उभय

साधुsādhu

उत्तम हों

√साध्

सःsaḥ

वह

तद्

शिक्षकाणाम्śikṣakāṇām

शिक्षकों में

√शिक्ष्

धुरिdhuri

अग्रणी स्थान पर

धुर्

प्रतिष्ठापयितव्यःpratiṣṭhāpayitavyaḥ

स्थापित किया जाना चाहिए

प्रति + √स्था

एवeva

ही

व्याख्या

यह श्लोक आदर्श शिक्षक को दो गुणों के संगम से परिभाषित करता है: 'क्रिया', अर्थात् स्वयं किसी कार्य में निपुणता, और 'सङ्क्रान्ति', अर्थात् उस ज्ञान या कौशल को दूसरे तक पहुँचाने की क्षमता। कुछ लोगों की श्रेष्ठता आत्मसंस्था होती है, यानी वह केवल उनके अपने भीतर सीमित रह जाती है; कुछ लोग समझाने में कुशल होते हैं, पर स्वयं उतनी गहराई से निपुण नहीं होते। श्रेष्ठ शिक्षक वह है जिसमें अनुभवजन्य निपुणता और संप्रेषण-कौशल दोनों हों। इस दृष्टि से शिक्षण केवल सूचना देना नहीं, बल्कि क्षमता का सुगठित संचार है। ऐसा शिक्षक ही शिक्षकों की अग्र पंक्ति में प्रतिष्ठित होने योग्य है, क्योंकि वह जो सिखाता है उसे स्वयं जीता भी है और दूसरों में भी वही उत्कृष्टता जगाता है।

मूल पोस्ट

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3 सित॰ 2026
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