श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था सङ्क्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता। यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव॥
śliṣṭā kriyā kasyacid ātmasaṃsthā saṅkrāntir anyasya viśeṣayuktā । yasyobhayaṃ sādhu sa śikṣakāṇāṃ dhuri pratiṣṭhāpayitavya eva ॥
श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था का अर्थ
कुछ लोग स्वयं किसी कार्य को करने में बहुत निपुण होते हैं, जबकि कुछ अन्य लोग उस ज्ञान या कौशल को दूसरों तक बहुत अच्छी तरह पहुँचाने में विशेष योग्य होते हैं। जिस व्यक्ति में ये दोनों गुण, खुद में निपुणता और दूसरों को सिखाने की क्षमता, निहित हों, उसे ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों की श्रेणी में सबसे आगे स्थान दिया जाना चाहिए।
शब्दार्थ
- श्लिष्टाśliṣṭā
सुसम्बद्ध, निपुण
√श्लिष्
- क्रियाkriyā
क्रिया
√कृ
- कस्यचित्kasyacit
किसी की
किम्
- आत्मसंस्थाātmasaṁsthā
स्वयं में स्थित
आत्मन् + सम् + √स्था
- सङ्क्रान्तिःsaṅkrāntiḥ
सङ्क्रमण, दूसरे तक पहुँचाना
सम् + √क्रम्
- अन्यस्यanyasya
दूसरे की
अन्य
- विशेषयुक्ताviśeṣayuktā
विशेषता से युक्त
विशेष + √युज्
- यस्यyasya
जिसमें
यद्
- उभयम्ubhayam
दोनों
उभय
- साधुsādhu
उत्तम हों
√साध्
- सःsaḥ
वह
तद्
- शिक्षकाणाम्śikṣakāṇām
शिक्षकों में
√शिक्ष्
- धुरिdhuri
अग्रणी स्थान पर
धुर्
- प्रतिष्ठापयितव्यःpratiṣṭhāpayitavyaḥ
स्थापित किया जाना चाहिए
प्रति + √स्था
- एवeva
ही
व्याख्या
यह श्लोक आदर्श शिक्षक को दो गुणों के संगम से परिभाषित करता है: 'क्रिया', अर्थात् स्वयं किसी कार्य में निपुणता, और 'सङ्क्रान्ति', अर्थात् उस ज्ञान या कौशल को दूसरे तक पहुँचाने की क्षमता। कुछ लोगों की श्रेष्ठता आत्मसंस्था होती है, यानी वह केवल उनके अपने भीतर सीमित रह जाती है; कुछ लोग समझाने में कुशल होते हैं, पर स्वयं उतनी गहराई से निपुण नहीं होते। श्रेष्ठ शिक्षक वह है जिसमें अनुभवजन्य निपुणता और संप्रेषण-कौशल दोनों हों। इस दृष्टि से शिक्षण केवल सूचना देना नहीं, बल्कि क्षमता का सुगठित संचार है। ऐसा शिक्षक ही शिक्षकों की अग्र पंक्ति में प्रतिष्ठित होने योग्य है, क्योंकि वह जो सिखाता है उसे स्वयं जीता भी है और दूसरों में भी वही उत्कृष्टता जगाता है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
मालविकाग्निमित्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंपात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः। जलमिव समुद्रशुक्तौ मुक्ताफलतां पयोदस्य॥
pātraviśeṣe nyastaṃ guṇāntaraṃ vrajati śilpam ādhātuḥ । jalam iva samudraśuktau muktāphalatāṃ payodasya ॥
कालिदास का यह श्लोक योग्य पात्र में विकसित कौशल की तुलना सीप में मोती बनने वाले मेघजल से करता है।
शिक्षा पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।