प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा। शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥
prerakaḥ sūcakaścaiva vācako darśakastathā । śikṣakaḥ bodhakaścaiva ṣaḍete guravaḥ smṛtāḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशगुरु पूर्णिमा की सभी देशवासियों को बहुत-बहुत बधाई। गुरु ज्ञान के साथ ही अपने शिष्यों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर उन्हें सुविचार और सुसंस्कारों से सुशिक्षित करते हैं। आइए, उनके आदर्शों को अपने जीवन का संबल बनाएं।
प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा का अर्थ
जो जीवन में प्रेरणा का संचार करे, सही दिशा का संकेत दे, ज्ञान और सत्य का उपदेश करे, उचित मार्ग दिखाए, शिक्षा प्रदान करे तथा जीवन में सत्य का बोध कराकर आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त करे-ये गुरु के छह स्वरूप बताए गए हैं।
शब्दार्थ
- प्रेरकःprerakaḥ
प्रेरित करने वाला
प्र + √ईर्
- सूचकःsūcakaḥ
संकेत करने वाला
√सूच्
- च एवcaiva
और
- वाचकःvācakaḥ
कहने वाला
√वच्
- दर्शकःdarśakaḥ
दिखाने वाला
√दृश्
- तथाtathā
तथा
- शिक्षकःśikṣakaḥ
शिक्षा देने वाला
√शिक्ष्
- बोधकःbodhakaḥ
बोध कराने वाला
√बुध्
- षट् एतेṣaḍ ete
ये छह
षष्
- गुरवःguravaḥ
गुरु
गुरु
- स्मृताःsmṛtāḥ
माने गए हैं
√स्मृ
व्याख्या
यह श्लोक गुरु को किसी पद या उपाधि से नहीं, बल्कि छह सक्रिय भूमिकाओं से पहचानता है। ‘प्रेरक’ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, ‘सूचक’ संकेत करता है, ‘वाचक’ किसी बात को शब्दों में स्पष्ट करता है और ‘दर्शक’ उसे प्रत्यक्ष अथवा बोधगम्य बनाता है। अन्तिम दो रूपों में ‘शिक्षक’ विधिपूर्वक शिक्षा देता है, जबकि ‘बोधक’ विद्यार्थी के भीतर समझ जगाता है। ये छह शब्द मिलकर शिक्षण की एक क्रमिक प्रक्रिया सामने रखते हैं: प्रेरणा और दिशा से आरम्भ होकर वह कथन, प्रदर्शन और शिक्षा से गुजरती हुई वास्तविक बोध तक पहुँचती है। ‘गुरवः’ का बहुवचन यह भी स्वीकार करता है कि जीवन में ये भूमिकाएँ एक से अधिक मार्गदर्शकों द्वारा निभाई जा सकती हैं। गुरु पूर्णिमा का साथ दिया गया संदेश इसी छह रूपों वाली दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए उन गुरुओं का सम्मान करता है जो ज्ञान, सकारात्मक ऊर्जा, सुविचार और संस्कारों से शिष्यों का जीवन गढ़ते हैं।
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मार्गदर्शन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।