अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं का अर्थ
मनुष्य को सदैव ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो और किसी के मन में अशांति उत्पन्न न करे। सद्ग्रंथों का निरंतर स्वाध्याय और चिंतन ही वाणी को वास्तविक सार्थकता प्रदान करता है। विचारपूर्वक बोली गई वाणी समाज में शांति, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करती है।
शब्दार्थ
- अनुद्वेगकरम्anudvegakaram
उद्वेग उत्पन्न न करने वाला
अन् + उद्वेग + √कृ
- वाक्यम्vākyam
वचन
√वच्
- सत्यम्satyam
सत्य
सत्
- प्रियहितम्priyahitam
प्रिय और हितकारी
प्रिय + हित
- च यत्ca yat
और जो
- स्वाध्यायाभ्यसनम्svādhyāyābhyasanam
स्वाध्याय का नियमित अभ्यास
स्वाध्याय + अभ्यसन
- च एवcaiva
और भी
- वाङ्मयम्vāṅmayam
वाणी से सम्बन्धित
वाच् + मय
- तपःtapaḥ
तप
√तप्
- उच्यतेucyate
कहा जाता है
√वच्
व्याख्या
यह श्लोक वाणी से किए जाने वाले तप, अर्थात् वाङ्मय तप, की परिभाषा देता है। वचन एक साथ चार कसौटियों पर खरा होना चाहिए: वह सुनने वाले को उद्विग्न न करे और सत्य, प्रिय तथा हितकारी हो। केवल असत्य से बचना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि सत्य कहते समय उसके प्रभाव और प्रयोजन का ध्यान रखना भी इस अनुशासन का भाग है। श्लोक स्वाध्यायाभ्यसन, यानी पवित्र ग्रंथों के नियमित अध्ययन या पाठ, को भी वाणी के तप में रखता है। दिया गया अर्थ इस शिक्षा को सामाजिक शांति और सद्भाव से जोड़ता है; श्लोक का सीधा कथन वाणी के गुणों और उसे साधने वाले नियमित अभ्यास पर केन्द्रित है।
मूल पोस्ट
भगवद् गीता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
नैतिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।