शं नो द्यावापृथिवी - द्युलोक और पृथ्वी से मंगल

30 जुल॰ 2026

शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥

śaṁ no dyāvāpṛthivī pūrvahūtau śam antarikṣaṁ dṛśaye no astu । śaṁ na oṣadhīr vanino bhavantu śaṁ no rajasas patir astu jiṣṇuḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

प्रकृति, पर्यावरण और समस्त सृष्टि का सम्मान हमारे अस्तित्व के मूल में है। आइए, हम इनके प्रति पूरी कृतज्ञता और सेवाभाव के साथ एक स्वस्थ, समृद्ध और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में सहभागी बनें।

शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ का अर्थ

द्युलोक और पृथ्वी, जो सृष्टि के आदि से पूजनीय हैं, हमारे लिए सदैव कल्याणकारी हों। पृथ्वी और सूर्य के बीच स्थित अंतरिक्ष हमारे जीवन के लिए हितकारी और ज्ञानवर्धक हो। सभी औषधियाँ और वनस्पतियाँ हमें स्वास्थ्य, पोषण और सुख प्रदान करें। समस्त लोकों के सर्वव्यापक और विजयशील स्वामी ईश्वर हमारे लिए सदैव कल्याण, शांति और समृद्धि देने वाले हों।

शब्दार्थ

शम् नःśaṁ naḥ

हमें शान्ति

√शम्

द्यावापृथिवीdyāvāpṛthivī

द्युलोक और पृथ्वी

दिव् + पृथिवी

पूर्वहूतौpūrvahūtau

पहले या प्रमुख रूप से आहूत वे दोनों

पूर्व + √हू

शम् अन्तरिक्षम्śam antarikṣam

शान्तिमय अन्तरिक्ष

अन्तरिक्ष

दृशयेdṛśaye

देखने के लिए

√दृश्

नः अस्तुno astu

हमारे लिए हो

√अस्

ओषधीःoṣadhīḥ

औषधियाँ

ओषधि

वनिनःvaninaḥ

वनस्पतियाँ

वन

भवन्तुbhavantu

हों

√भू

रजसः पतिःrajasas patiḥ

रजस् का स्वामी

रजस् + पति

अस्तु जिष्णुःastu jiṣṇuḥ

विजयी हो

√जि

व्याख्या

इस मन्त्र में ‘शम्’ शब्द बार-बार आकर मंगल और कल्याण की कामना करता है। सबसे पहले ‘द्यावापृथिवी’, अर्थात द्युलोक और पृथ्वी के युगल का आह्वान है। उनके लिए आया द्विवचन विशेषण ‘पूर्वहूतौ’ का अर्थ है ‘वे दोनों जिनका पहले या प्रमुख रूप से आह्वान किया गया है।’ साथ दिए अर्थ का ‘सृष्टि के आदि से पूजनीय’ एक व्याख्यात्मक विस्तार है, इस पद का शाब्दिक अर्थ नहीं। इसके बाद अन्तरिक्ष से हमारी दृष्टि के लिए अनुकूल होने तथा औषधियों और वन-वृक्षों से कल्याणकारी होने की प्रार्थना है। अन्तिम चरण ‘रजस्’ के विजयशील अधिपति को सम्बोधित करता है, जहाँ रजस् प्रकाशमय या अन्तरिक्षीय क्षेत्र हो सकता है। ब्रह्माण्डीय क्षेत्रों, औषधियों, वृक्षों और दैवी शक्ति को एक ही ‘शम्’ की कामना में रखना व्यापक कल्याण का चित्र बनाता है। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, सेवाभाव, स्वास्थ्य, समृद्धि और सामूहिक सामर्थ्य साथ दिए संदेश का आधुनिक अनुप्रयोग है, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत और पाठभेद

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ऋग्वेद से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता

प्रकृति पर और सुभाषित

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28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

स्वास्थ्यकल्याण
22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण