न जातु शौर्यं - शौर्य का पुनरुदय

31 जुल॰ 2026

न जातु शौर्यं पुरुषस्य भानुरस्तं गतो भवति कदापि शश्वत्। यथा पुनस्तपति दिवाकरोऽयं तथा पुनर्विक्रमते स वीरः॥

na jātu śauryaṁ puruṣasya bhānurastaṁ gato bhavati kadāpi śaśvat । yathā punastapati divākaro'yaṁ tathā punarvikramate sa vīraḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

महान क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह को उनके बलिदान दिवस पर सादर नमन। हिम्मत और हौसले से भरी उनकी जीवनगाथा देश की हर पीढ़ी को मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्रेरित करती रहेगी।

न जातु शौर्यं पुरुषस्य का अर्थ

वीर पुरुष का शौर्य रूपी सूर्य कभी स्थायी रूप से अस्त नहीं होता। जैसे सूर्य फिर से उदय होकर तपता है, वैसे ही वीर पुरुष हर परिस्थिति के बाद पुनः अपने पराक्रम से विजय प्राप्त करता है।

शब्दार्थ

न जातुna jātu

कभी नहीं

शौर्यम्śauryam

शौर्य

√शूर्

पुरुषस्यpuruṣasya

पुरुष का

पुरुष

भानुःbhānuḥ

सूर्य

√भा

अस्तम् गतःastaṁ gataḥ

अस्त हुआ

√गम्

भवतिbhavati

होता है

√भू

कदापि शश्वत्kadāpi śaśvat

सदा के लिए

यथाyathā

जैसे

पुनः तपतिpunas tapati

फिर तपता है

√तप्

दिवाकरःdivākaraḥ

दिवाकर

दिवा + √कृ

तथाtathā

वैसे ही

पुनः विक्रमतेpunar vikramate

फिर पराक्रम करता है

वि + √क्रम्

सः वीरःsa vīraḥ

वह वीर

वीर

व्याख्या

यह श्लोक शौर्य को ऐसे सूर्य के रूप में देखता है जिसका दिखाई देने वाला अस्त होना कभी अन्तिम नहीं होता। यह उपमा पराजय, ओझल होने या थकान के क्षणों का निषेध नहीं करती; वह बताती है कि अन्धकार के बाद फिर चमकने वाले सूर्य की तरह साहस दोबारा कर्म में प्रकट हो सकता है। ‘शौर्य’ वीरतापूर्ण साहस का नाम है, जबकि ‘विक्रमते’ आगे बढ़कर पराक्रम करने का भाव व्यक्त करता है। यहाँ ‘पुनः’ का भाव शिक्षा का केन्द्र है: वीर की पहचान विपत्ति से कभी न घिरने में नहीं, बल्कि उसके सामने फिर उठ खड़े होने में है। इसीलिए साहस और दृढ़ता परस्पर जुड़े हैं, क्योंकि शौर्य किसी एक नाटकीय क्षण से नहीं, बार-बार किए गए पराक्रमी कर्म से सिद्ध होता है। साथ दिया गया संदेश इसी बिम्ब को उधम सिंह के जीवन से जोड़ते हुए उनके साहस और संकल्प को मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा की चिरस्थायी प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करता है।

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साहस पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

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स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
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हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस