त्याज्यं न धैर्यं - विपत्ति में दृढ़ता

3 अग॰ 2026

त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥

tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥

त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि का अर्थ

भाग्य के प्रतिकूल होने पर भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि धैर्य के कारण वह कभी भी अपनी खोई हुई अनुकूल स्थिति को पुनः प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार समुद्र के बीच में जहाज टूट जाने पर भी एक कुशल नाविक केवल अपने कर्म अर्थात् जीवित रहने और तैरने के प्रयास की ही इच्छा करता है और हिम्मत नहीं हारता।

शब्दार्थ

त्याज्यम्tyājyam

त्यागने योग्य

√त्यज्

नna

नहीं

धैर्यम्dhairyam

धैर्य

√धृ

विधुरेvidhure

विपत्ति में

विधुर

अपि दैवेapi daive

दैव के भी

दैव

कदाचित्kadācit

कभी

स्थितिम्sthitim

स्थिति

√स्था

आप्नुयात्āpnuyāt

पा सकता है

√आप्

यातेyāte

बह जाने पर

√या

समुद्रेsamudre

समुद्र में

समुद्र

पोतभङ्गेpotabhaṅge

जहाज़ टूट जाने पर

पोत + √भञ्ज्

सांयात्रिकःsāṁyātrikaḥ

नाविक

सम् + √यात्

वाञ्छतिvāñchati

चाहता है

√वाञ्छ्

कर्म एवkarma eva

कर्म ही

√कृ

व्याख्या

श्लोक का आरम्भ सीधे निर्देश से होता है कि प्रतिकूल भाग्य में भी ‘धैर्य’—अर्थात् मन की स्थिरता और साहस—का त्याग नहीं करना चाहिए। इसका आश्वासन चमत्कार का नहीं, सम्भावना का है: दृढ़ बने रहने से मनुष्य कभी अपनी स्थिति फिर प्राप्त कर सकता है। पोतभंग के बाद समुद्रयात्री का बिम्ब इस शिक्षा को सजीव करता है; जहाज नष्ट हो गया और समुद्र अब भी संकटपूर्ण है, फिर भी यात्री कर्म की ओर उन्मुख रहता है। अन्त के ‘कर्म एव’ शब्द उस काम पर ध्यान रखते हैं जो कठिन परिस्थिति में भी किया जा सकता है। यहाँ धैर्य निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, बल्कि अनिश्चितता के बीच सार्थक प्रयास को जीवित रखने वाली आन्तरिक स्थिरता है। इस प्रकार श्लोक दृढ़ता और कर्म को जोड़ते हुए सिखाता है कि विपत्ति के सामने समर्पण नहीं, संयम और सतत प्रयास आवश्यक हैं।

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पञ्चतन्त्र से और सुभाषित

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5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

दृढ़ता पर और सुभाषित

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7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

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ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता