न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥
प्रधानमंत्री का संदेशनिरंतर प्रयास और साधना से हमारी प्रतिभा और निखरती है। आज हमारे युवा इन्हीं गुणों को आत्मसात कर दुनियाभर में देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
न हि ज्ञानेन सदृशं का अर्थ
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। कर्मयोग या साधना के द्वारा जिसका अंतःकरण भली-भांति शुद्ध हो गया है, वह साधक समय आने पर उस परम ज्ञान को अपने आप ही अपने भीतर आत्मा में अनुभव कर लेता है।
शब्दार्थ
- न हिna hi
नहीं है
- ज्ञानेनjñānena
ज्ञान के
√ज्ञा
- सदृशम्sadṛśam
समान
स + √दृश्
- पवित्रम्pavitram
पवित्र करने वाला
√पू
- इहiha
यहाँ
- विद्यतेvidyate
विद्यमान है
√विद्
- तत्tat
उसे
तद्
- स्वयम्svayam
स्वयं
- योगसंसिद्धःyogasaṁsiddhaḥ
योग में सिद्ध हुआ
योग + सम् + √सिध्
- कालेनkālena
समय के साथ
काल
- आत्मनिātmani
अपने भीतर
आत्मन्
- विन्दतिvindati
पाता है
√विद्
व्याख्या
यह श्लोक ‘ज्ञान’ को संसार में सबसे अधिक पवित्र करने वाली वस्तु कहता है। यहाँ पवित्रता केवल जानकारी एकत्र करने से नहीं आती: योग से सिद्ध व्यक्ति उस ज्ञान को अपने ‘आत्मनि’, अर्थात् अपने भीतर, पाता है। ‘योगसंसिद्धः’ योग द्वारा परिपक्व या सिद्ध हुए साधक का बोध कराता है, जबकि ‘कालेन’ बताता है कि यह अनुभूति समय के साथ परिपक्व होती है। इस प्रकार ज्ञान को अनुशासित योग-साधना से फलित होने वाले आन्तरिक साक्षात्कार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। श्लोक तात्कालिक उपलब्धि का वचन नहीं देता; वह निरन्तर तैयारी और अपने भीतर सत्य के मिलने को जोड़ता है। साथ का संदेश इसी निरन्तर प्रयास और साधना को युवाओं की प्रतिभा निखारने और विश्व में देश का नाम रोशन करने से जोड़ता है।
मूल पोस्ट
भगवद् गीता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।