योग पर सुभाषित
यह विषय 5 स्रोतों से आए 4 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 4 अग॰ 2026
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥
ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र करने वाला नहीं; योग से सिद्ध साधक उसे समय आने पर अपने भीतर पाता है।
चित्तप्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते। प्राणस्पन्दनिरोधो वा द्वेधा योगस्य धारणा॥
cittapraśamanopāyo yoga ity abhidhīyate । prāṇaspandanirodho vā dvedhā yogasya dhāraṇā ॥
योग को मन शांत करने और प्राण की गति को नियंत्रित करने वाली दोहरी साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥
yogena cittasya padena vācāṃ malaṃ śarīrasya ca vaidyakena । yo'pākarot taṃ pravaraṃ munīnāṃ patañjaliṃ prāñjalir ānato'smi ॥
महर्षि पतञ्जलि को समर्पित यह पारंपरिक मंगलाचरण मन के लिए योग, वाणी के लिए व्याकरण और शरीर के लिए आयुर्वेद की शुद्धिकारक भूमिका बताता है।
आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा॥ धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम्। समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम्॥
āsanena rujo hanti prāṇāyāmena pātakam । vikāraṁ mānasaṁ yogī pratyāhāreṇa sarvadā ॥ dhāraṇābhir mano dhairyaṁ yāti caitanyam adbhutam । samādhau mokṣam āpnoti tyaktvā karma śubhāśubham ॥
आसन, प्राणायाम और अनुशासित योगाभ्यास शरीर के रोग और अंतर्मन की अशुद्धि दूर कर साधक को गहन मुक्ति के लिए तैयार करते हैं।