आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा॥ धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम्। समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम्॥
āsanena rujo hanti prāṇāyāmena pātakam । vikāraṁ mānasaṁ yogī pratyāhāreṇa sarvadā ॥ dhāraṇābhir mano dhairyaṁ yāti caitanyam adbhutam । samādhau mokṣam āpnoti tyaktvā karma śubhāśubham ॥
आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन का अर्थ
आसन से रोगों का नाश होता है और प्राणायाम से पापों का। योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारण से मन में धैर्य आता है तथा अद्भुत चेतन्य की प्राप्ति होती है। समाधि में शुभ-अशुभ कर्म त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
शब्दार्थ
- आसनेनāsanena
आसन से
√आस्
- रुजःrujaḥ
रोगों को
√रुज्
- हन्तिhanti
नष्ट करता है
√हन्
- प्राणायामेनprāṇāyāmena
प्राणायाम से
प्राण + आ + √यम्
- पातकम्pātakam
पातक
√पत्
- विकारम्vikāram
विकार
वि + √कृ
- मानसम्mānasam
मानसिक
मनस्
- योगीyogī
योगी
√युज्
- प्रत्याहारेणpratyāhāreṇa
प्रत्याहार से
प्रति + आ + √हृ
- धारणाभिःdhāraṇābhiḥ
धारणाओं से
√धृ
- मनोधैर्यम्manodhairyam
मन का धैर्य
मनस् + √धृ
- चैतन्यम् अद्भुतम्caitanyam adbhutam
अद्भुत चैतन्य
√चित्
- समाधौsamādhau
समाधि में
सम् + आ + √धा
- मोक्षम् आप्नोतिmokṣam āpnoti
मोक्ष पाता है
√मुच् + √आप्
- त्यक्त्वाtyaktvā
त्यागकर
√त्यज्
- कर्म शुभाशुभम्karma śubhāśubham
शुभ और अशुभ कर्म
√कृ
व्याख्या
योगचूडामणि उपनिषद का यह सुभाषित योग की समग्र प्रकृति को रेखांकित करता है। यह केवल शरीर या मन का अलग-अलग उपचार नहीं करता, बल्कि उन्हें एक सूत्र में देखता है। जहाँ 'आसन' शारीरिक रोगों को दूर करता है, वहीं 'प्राणायाम' को नैतिक और आध्यात्मिक शुद्धि का साधन बताया गया है। 'प्रत्याहार' और 'धारणा' के माध्यम से साधक बाहरी दुनिया से अंतर्मन की ओर बढ़ता है, जिसका समापन 'समाधि' में होता है—एक ऐसी अवस्था जहाँ व्यक्ति शुभ-अशुभ के द्वंद्व से ऊपर उठकर मोक्ष प्राप्त करता है। यह अंश एक सोपान है और प्रत्येक पायदान उसी से जोड़ा गया है जिसे वह वस्तुतः हटा सकता है: आसन से शारीरिक रुजा, प्राणायाम से संचित पातक, प्रत्याहार से मानस विकार, धारणा से चंचलता। किसी अंग से वह नहीं माँगा गया जो आगे का अंग करेगा। अन्तिम चरण क्रम तोड़ता है, क्योंकि समाधि किसी दोष का निवारण नहीं, एक त्याग माँगती है—'त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम्', अर्थात् शुभ और अशुभ दोनों कर्मों को छोड़कर।
मूल पोस्ट
योग पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।