योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥
yogena cittasya padena vācāṃ malaṃ śarīrasya ca vaidyakena । yo'pākarot taṃ pravaraṃ munīnāṃ patañjaliṃ prāñjalir ānato'smi ॥
प्रधानमंत्री का संदेशयोग का नियमित अभ्यास तन को स्वस्थ और मन को शांत रखता है। इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने से जीवन संतुलित और ऊर्जावान बनता है।
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां का अर्थ
मन की चित्त वृत्तियों को योग से, वाणी को व्याकरण से और शरीर की अशुद्धियों को आयुर्वेद द्वारा शुद्ध करने वाले मुनियों में सर्वश्रेष्ठ महर्षि पतञ्जलि को मैं दोनों हाथ जोड़कर नमन करता हूँ।
शब्दार्थ
- योगेनyogena
योग से
√युज्
- चित्तस्यcittasya
चित्त का
√चित्
- पदेनpadena
पद-शास्त्र से
पद
'पद' अर्थात् शब्दशास्त्र—पतञ्जलि का महाभाष्य।
- वाचाम्vācām
वाणी का
वाच्, √वच्
- मलम्malam
मल
मल
- शरीरस्यśarīrasya
शरीर का
शरीर
- चca
और
- वैद्यकेनvaidyakena
वैद्यक से
विद्या
- यःyaḥ
जिन्होंने
यद्
- अपाकरोत्apākarot
दूर किया
अप + आ + √कृ
- तम्tam
उन्हें
तद्
- प्रवरम्pravaram
श्रेष्ठ
प्र + √वृ
- मुनीनाम्munīnām
मुनियों में
मुनि
- पतञ्जलिम्patañjalim
पतञ्जलि को
- प्राञ्जलिःprāñjaliḥ
हाथ जोड़े हुए
प्र + अञ्जलि
- आनतः अस्मिānato'smi
मैं नत हूँ
आ + √नम्
व्याख्या
यह मंगलाचरण पतञ्जलि को ऐसे मुनि के रूप में प्रणाम करता है जिन्होंने मानव जीवन के तीन महत्त्वपूर्ण साधनों—मन, वाणी और शरीर—की शुद्धि का मार्ग दिखाया। योग चित्त की अशुद्धियों और विक्षेपों को दूर करने वाला अनुशासन है; पद या व्याकरण वाणी को स्पष्ट और संयमित बनाता है; और वैद्यक शरीर के स्वास्थ्य और शुद्धि से जुड़ा है। यह श्लोक पतञ्जलि की उस पारंपरिक छवि को सामने रखता है जो योगसूत्र, महाभाष्य और चिकित्सा-परंपरा से जुड़ी हुई है। ये सभी ग्रंथ एक ही ऐतिहासिक व्यक्ति से जुड़े हों या पतञ्जलि-परंपरा से, श्लोक का मूल भाव स्पष्ट है: सच्चा परिष्कार मन, अभिव्यक्ति और शरीर तीनों को साथ लेकर चलता है। दैनिक योगाभ्यास के संदर्भ में यह शिक्षा अत्यंत व्यावहारिक बन जाती है। संतुलित जीवन केवल शरीर की देखभाल या केवल मन की शांति से नहीं, बल्कि अनुशासन, स्पष्टता और स्वास्थ्य को एक साथ जीवनचर्या में लाने से बनता है।
मूल पोस्ट
योग पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।