धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्। लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा॥
dhanyānām uttamaṃ dākṣyaṃ dhanānām uttamaṃ śrutam । lābhānāṃ śreya ārogyaṃ sukhānāṃ tuṣṭir uttamā ॥
प्रधानमंत्री का संदेशविद्या से विवेक, कौशल से विकास और उत्तम स्वास्थ्य से हर संकल्प को सिद्धि मिलती है। आज हमारे युवा इन्हीं गुणों को आत्मसात कर देश की पहचान को और सशक्त बना रहे हैं।
धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं का अर्थ
सभी श्रेष्ठ गुणों में कौशल सबसे उत्तम है, सभी धनों में विद्या सबसे बड़ी सम्पत्ति है, सभी लाभों में उत्तम स्वास्थ्य सबसे बड़ा लाभ है और सभी सुखों में सन्तोष सबसे श्रेष्ठ है।
शब्दार्थ
- धन्यानाम्dhanyānām
धन्य वस्तुओं में
धन्य
- उत्तमम्uttamam
सर्वोत्तम
उद् + तम
- दाक्ष्यम्dākṣyam
दक्षता
दक्ष
- धनानाम्dhanānām
धनों में
धन
- श्रुतम्śrutam
श्रुत, विद्या
√श्रु
- लाभानाम्lābhānām
लाभों में
√लभ्
- श्रेयःśreyaḥ
श्रेयस्कर
श्रेयस्
- आरोग्यम्ārogyam
आरोग्य
अ + रोग
- सुखानाम्sukhānām
सुखों में
सुख
- तुष्टिःtuṣṭiḥ
सन्तोष
√तुष्
- उत्तमाuttamā
सर्वोत्तम है
उद् + तम
व्याख्या
यह श्लोक महाभारत के यक्षप्रश्न प्रसंग से है, जहाँ युधिष्ठिर यक्ष के संक्षिप्त लेकिन गहरे प्रश्नों का उत्तर देते हैं। इसमें चार श्रेष्ठताओं की पहचान की गई है: ‘दाक्ष्य’ अर्थात व्यावहारिक कौशल या कार्यकुशलता धन्य लोगों का श्रेष्ठ गुण है; ‘श्रुतम्’ अर्थात विद्या या सुना-समझा ज्ञान सबसे बड़ा धन है; ‘आरोग्य’ सबसे बड़ा लाभ है; और ‘तुष्टि’ अर्थात संतोष सबसे बड़ा सुख है। यह क्रम बाहरी क्षमता और आंतरिक संतुलन, दोनों को साथ रखता है। श्लोक धन, विद्या, स्वास्थ्य और सुख को अलग-अलग लक्ष्य नहीं मानता। कौशल सौभाग्य को उपयोगी बनाता है, विद्या धन को अर्थ देती है, स्वास्थ्य हर प्रयास को आधार देता है और संतोष सुख को अंतहीन लालसा से बचाता है। प्रधानमंत्री के पोस्ट में शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और युवा-शक्ति पर दिया गया जोर इसी प्राचीन जीवन-दृष्टि का आधुनिक नागरिक रूप है।
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।