देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत। पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥
devadeva jagannātha surāsuranamaskṛta । puṇyaślokāvyayānanta paramātman namo’stu te ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमहाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा के पावन अवसर पर मेरी कामना है कि उनका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बना रहे। उनकी दिव्य कृपा से सभी देशवासियों के जीवन में नई ऊर्जा का संचार हो।
देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत का अर्थ
देवताओं के भी देव और सम्पूर्ण जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ की देवताओं से लेकर समस्त प्राणी श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं। उनका यश पवित्र एवं कल्याणकारी है। वे अविनाशी, अनन्त तथा समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान परमात्मा हैं। ऐसे भगवान जगन्नाथ को बार-बार नमस्कार है।
शब्दार्थ
- देवदेवdevadeva
हे देवों के देव
देव
- जगन्नाथjagannātha
हे जगन्नाथ
जगत् + नाथ
- सुरासुरनमस्कृतsurāsuranamaskṛta
सुरों और असुरों द्वारा वन्दित
सुर + असुर + √नम्
- पुण्यश्लोकpuṇyaśloka
हे पुण्यकीर्ति
पुण्य + श्लोक
- अव्ययavyaya
हे अव्यय
अ + वि + √इ
- अनन्तananta
हे अनन्त
अन् + अन्त
- परमात्मन्paramātman
हे परमात्मा
परम + आत्मन्
- नमः अस्तु तेnamo'stu te
आपको नमस्कार हो
√नम्
व्याख्या
यह श्लोक सीधे स्तुति के रूप में भगवान जगन्नाथ को संबोधित करता है। ‘देवदेव’ उन्हें देवताओं के भी देव के रूप में प्रस्तुत करता है और ‘जगन्नाथ’ उन्हें सम्पूर्ण जगत का स्वामी बताता है। ‘सुरासुरनमस्कृत’ शब्द उनकी उपासना को किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रखता; देवता और असुर दोनों उनके आगे श्रद्धा से झुकते हैं। दूसरी पंक्ति बाहरी पूजा से आगे बढ़कर उन्हें ‘अव्यय’, ‘अनन्त’ और ‘परमात्मा’ के रूप में देखती है। इसे हर हृदय में स्थित मानना व्यापक धार्मिक व्याख्या है, श्लोक का प्रत्यक्ष कथन नहीं। रथ यात्रा के संदर्भ में यह भाव और स्पष्ट हो जाता है। रथ पर विराजमान महाप्रभु मंदिर की सीमा से बाहर आकर लोक के बीच आते हैं, इसलिए यह पर्व कृपा, सामूहिक भक्ति और जीवन में नई ऊर्जा के संचार का प्रतीक बन जाता है।
मूल पोस्ट
स्कन्द पुराण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्। यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥
daśaputrasamā kanyā daśaputrān pravardhayan । yat phalam labhate martyastal labhyaṁ kanyayaikayā ॥
एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है, यह श्लोक एक कन्या के पालन-पोषण के पुण्य को समझाता है।
आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥
ādināthena śarveṇa sarvaprāṇihitāya vai । ādyatattvānyathānīyaṁ kṣetrametanmahāprabham । prabhāsitaṁ mahādevi yatra siddhyanti mānavāḥ ॥
भगवान शिव के आदिनाथ रूप द्वारा जन-कल्याण हेतु प्रकट किया गया प्रभास क्षेत्र, जहाँ दिव्यता और सिद्धि का वास है।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंत्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā । sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ॥
देवी महात्म्यम् का यह श्लोक देवी को विश्व का मूल कारण और अपनी कृपा से मुक्ति देने वाली शक्ति के रूप में स्तुति करता है।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।