देवदेव जगन्नाथ - प्रभु को नमस्कार

16 जुल॰ 2026

देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत। पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥

devadeva jagannātha surāsuranamaskṛta । puṇyaślokāvyayānanta paramātman namo’stu te ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा के पावन अवसर पर मेरी कामना है कि उनका आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बना रहे। उनकी दिव्य कृपा से सभी देशवासियों के जीवन में नई ऊर्जा का संचार हो।

देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत का अर्थ

देवताओं के भी देव और सम्पूर्ण जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ की देवताओं से लेकर समस्त प्राणी श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं। उनका यश पवित्र एवं कल्याणकारी है। वे अविनाशी, अनन्त तथा समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान परमात्मा हैं। ऐसे भगवान जगन्नाथ को बार-बार नमस्कार है।

शब्दार्थ

देवदेवdevadeva

हे देवों के देव

देव

जगन्नाथjagannātha

हे जगन्नाथ

जगत् + नाथ

सुरासुरनमस्कृतsurāsuranamaskṛta

सुरों और असुरों द्वारा वन्दित

सुर + असुर + √नम्

पुण्यश्लोकpuṇyaśloka

हे पुण्यकीर्ति

पुण्य + श्लोक

अव्ययavyaya

हे अव्यय

अ + वि + √इ

अनन्तananta

हे अनन्त

अन् + अन्त

परमात्मन्paramātman

हे परमात्मा

परम + आत्मन्

नमः अस्तु तेnamo'stu te

आपको नमस्कार हो

√नम्

व्याख्या

यह श्लोक सीधे स्तुति के रूप में भगवान जगन्नाथ को संबोधित करता है। ‘देवदेव’ उन्हें देवताओं के भी देव के रूप में प्रस्तुत करता है और ‘जगन्नाथ’ उन्हें सम्पूर्ण जगत का स्वामी बताता है। ‘सुरासुरनमस्कृत’ शब्द उनकी उपासना को किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रखता; देवता और असुर दोनों उनके आगे श्रद्धा से झुकते हैं। दूसरी पंक्ति बाहरी पूजा से आगे बढ़कर उन्हें ‘अव्यय’, ‘अनन्त’ और ‘परमात्मा’ के रूप में देखती है। इसे हर हृदय में स्थित मानना व्यापक धार्मिक व्याख्या है, श्लोक का प्रत्यक्ष कथन नहीं। रथ यात्रा के संदर्भ में यह भाव और स्पष्ट हो जाता है। रथ पर विराजमान महाप्रभु मंदिर की सीमा से बाहर आकर लोक के बीच आते हैं, इसलिए यह पर्व कृपा, सामूहिक भक्ति और जीवन में नई ऊर्जा के संचार का प्रतीक बन जाता है।

मूल पोस्ट

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स्कन्द पुराण से और सुभाषित

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22 जन॰ 2026
स्कन्द पुराण

दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्। यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥

daśaputrasamā kanyā daśaputrān pravardhayan । yat phalam labhate martyastal labhyaṁ kanyayaikayā ॥

एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है, यह श्लोक एक कन्या के पालन-पोषण के पुण्य को समझाता है।

नारीशक्तिसम्माननैतिकता
9 जन॰ 2026
स्कन्द पुराण

आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥

ādināthena śarveṇa sarvaprāṇihitāya vai । ādyatattvānyathānīyaṁ kṣetrametanmahāprabham । prabhāsitaṁ mahādevi yatra siddhyanti mānavāḥ ॥

भगवान शिव के आदिनाथ रूप द्वारा जन-कल्याण हेतु प्रकट किया गया प्रभास क्षेत्र, जहाँ दिव्यता और सिद्धि का वास है।

आध्यात्मिकताआत्मज्ञानधर्मभक्ति

भक्ति पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
17 सित॰ 2026
विश्वकर्माष्टकम्

अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥

anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥

विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।

भक्तिआध्यात्मिकता
14 सित॰ 2026
गणेशपञ्चरत्नम्

मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥

mudākarāttamodakaṁ sadā vimuktisādhakaṁ kalādharāvataṁsakaṁ vilāsilokarakṣakam । anāyakaikanāyakaṁ vināśitebhadaityakaṁ natāśubhāśunāśakaṁ namāmi taṁ vināyakam ॥

श्रीविनायक की यह भक्तिपूर्ण स्तुति उन्हें मुक्ति के साधक, जगत् के रक्षक और अशुभ के शीघ्र नाशक के रूप में नमन करती है।

भक्तिआध्यात्मिकतानेतृत्व