तव च का किल न स्तुतिरम्बिके! सकलशब्दमयी किल ते तनुः। निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो मनसिजासु बहिःप्रसरासु च॥
tava ca kā kila na stutirambike! sakalaśabdamayī kila te tanuḥ । nikhilamūrtiṣu me bhavadanvayo manasijāsu bahiḥprasarāsu ca ॥
तव च का किल का अर्थ
हे जगदम्बिके! संसार में भला ऐसा कौन-सा शब्द है, जो आपकी स्तुति नहीं है? क्योंकि आपका स्वरूप तो समस्त शब्दों से बना है। हे देवी! मेरे मन में उठने वाले सभी विचारों और बाहर दिखाई देने वाली समस्त आकृतियों एवं मूर्तियों में मुझे आपका ही स्वरूप दिखाई देता है।
शब्दार्थ
- तवtava
आपकी
- चca
और
- काkā
कौन-सी
- किलkila
भला; निश्चय ही
- नna
नहीं
- स्तुतिरम्बिकेstutirambike
हे अम्बिके, स्तुति
स्तुतिः + अम्बिके की सन्धि।
- सकलशब्दमयीsakalaśabdamayī
समस्त शब्दों से बनी हुई
सकल + शब्द + मयी; तनुः का स्त्रीलिंग विशेषण।
- किलkila
निश्चय ही
- तेte
आपका
- तनुःtanuḥ
शरीर; स्वरूप
- निखिलमूर्तिषुnikhilamūrtiṣu
समस्त रूपों में
निखिल + मूर्ति; सप्तमी बहुवचन।
- मेme
मेरे लिए; मेरी अनुभूति में
- भवदन्वयोbhavadanvayo
आपका सम्बन्ध; आपकी व्याप्ति
भवत् + अन्वयः; मनसिजासु से पहले अन्वयः का अन्वयो होता है।
- मनसिजासुmanasijāsu
मन में उत्पन्न होने वाले रूपों में
मनसि + ज; स्त्रीलिंग सप्तमी बहुवचन, मूर्तियों का विशेषण।
- बहिःप्रसरासुbahiḥprasarāsu
बाहर प्रकट होने वाले रूपों में
बहिः + प्रसर; यह भी मूर्तियों का विशेषण है।
- चca
और
व्याख्या
आरम्भ का प्रश्न पूछता है कि जब अम्बिका का स्वरूप समस्त शब्दों से बना है, तो कौन-सी वाणी उनकी स्तुति नहीं होगी। 'सकलशब्दमयी' में भाषा स्वयं देवी के स्वरूप का अंग है, इसलिए स्तुति किसी औपचारिक स्तोत्र तक सीमित नहीं रहती। दूसरी पंक्ति मन में उत्पन्न होने वाले रूपों और बाहर दिखाई देने वाले रूपों को साथ रखती है तथा वक्ता दोनों में देवी का सम्बन्ध अनुभव करता है। 'भवदन्वय' उनकी व्याप्ति या उनसे जुड़े होने का भाव व्यक्त करता है, और 'मे' इसे भक्त की अपनी अनुभूति बनाता है। दैनिक जीवन में यह भाव सोचते, बोलते और दृश्य संसार पर ध्यान देते समय देवी के स्मरण का आधार बन सकता है।
मूल पोस्ट
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंयैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥
yaistu bhaktyā smṛtā nūnaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate । ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣase tānna saṃśayaḥ ॥
देवी कवचम् की यह प्रार्थना भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण करने वालों की वृद्धि और रक्षा का आश्वासन देती है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
yā devī sarvabhūteṣu śakti-rūpeṇa saṃsthitā । namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान देवी को बारंबार नमन करती है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike । śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo’stu te ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना शरण देने वाली और समस्त उद्देश्यों को सिद्ध करने वाली मंगलमयी नारायणी को नमन करती है।